प्रतिज्ञान के आगामी अंक १५ का केंद्रीय विषय 'प्रयोग' है। जानिए प्रायोगिक लेखन की विधा, इसके रूप और भेदों को, और १३ नवंबर तक अपनी अप्रकाशित रचनाएँ भेजें।
प्रतिज्ञान अंक १४ | अंत हो तो कैसा हो?
जीवन, विचार, रिश्ते और समय, इन सबके बीच 'अंत' की प्रासंगिकता क्या है, इसी दार्शनिक और यथार्थवादी मंथन को समर्पित है यह विशेषांक। इस अंक में पढ़िए देश के विभिन्न कोने से आए रचनाकारों की चुनिंदा कविताएँ, कहानियाँ और वैचारिक आलेख।
‘हर शाख़ पर उल्लू बैठा है’ समीक्षा : थ्रिलर, व्यंग्य और देसी बोली का अद्भुत तालमेल
मुकुल रंजन के उपन्यास 'हर शाख़ पर उल्लू बैठा है' की विस्तृत समीक्षा। जानिए कैसे यह किताब कॉरपोरेट संस्कृति, मीडिया की दुनिया और इंसानी महत्वाकांक्षाओं पर तीखा व मनोरंजक व्यंग्य करती है।
प्रतिज्ञान अंक १३ | किरदार : नायक, खलनायक और कल्पना का रंगमंच
पढ़िए 'प्रतिज्ञान' का तेरहवां अंक, अब एक नए और आकर्षक फ्लिप-बुक (Flipbook) अवतार में! इस अंक में समकालीन हिंदी साहित्यकारों की कहानियाँ, कविताएँ, पत्र और लेख शामिल हैं, जो नैपथ्य में छिपे नायकों, खलनायकों और अनूठी कल्पनाओं को उजागर करते हैं। सभी पाठकों के लिए पूर्णतः निःशुल्क।
शब्द-शिल्पी – हिंदी कहानी लेखन प्रतियोगिता
इंतज़ार खत्म हुआ! 'शब्द-शिल्पी' के लिए हमें कुल ४७ आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से हमने १४ सर्वश्रेष्ठ लघु कथाओं का चयन किया है। 'शब्द-शिल्पी' के प्रथम संस्करण को एक बड़ी सफलता बनाने के लिए हम सभी लेखकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं।
‘प्रतिज्ञान’ का तीसरा अंक प्रकाशित: जब ‘जात’ बन जाती है सबसे बड़ी चुनौती!
हिंदी पत्रिका 'प्रतिज्ञान' के तीसरे अंक में पढ़िए 'अग्नि परीक्षा' का अगला भाग 'जात', जहाँ पत्रकार शालिनी लड़ रही है सत्ता से। साथ ही अन्य कवितायेँ, कहानियाँ, शायरी और बहुत कुछ।
अस्सी सावन – हिंदी ईबुक | कहानी और कविता संग्रह
हमने दिया था प्रॉम्प्ट - एक बुज़ुर्ग महिला का घूरता चेहरा। इस एक चेहरे पर पढ़िए ६ रचनायें - ३ कहानियाँ और ३ कवितायेँ। अभी डाउनलोड करें हिंदी ईबुक ‘अस्सी सावन’।
हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ का दूसरा अंक जारी
हिंदी पत्रिका 'प्रतिज्ञान' का दूसरा अंक अब अमेज़न पर उपलब्ध! इस अंक में ७ कहानियाँ (गोश्त, अग्निपरीक्षा, किराए का कमरा सहित), ७ कविताएँ, उपन्यास समीक्षा और 'वेद सार शिवस्तव स्तोत्र' का हिंदी अनुवाद पढ़ें। अभी खरीदें और पढ़ें।
हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ का अनावरण
हमारी हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ एक प्रयास है हिंदी साहित्य की नयी आवाज़ों को पाठकों तक ले जाने का। हिंदी साहित्य की नयी प्रतिभाओं को सम्मान और पहचान दिलाने की ये हमारी मुहीम है।
अटल जी की कवितायें – हार नहीं मानूँगा
अटल जी की कवितायें मैं आज भी जब भी पढ़ता हूँ, सुनता हूँ या सुनाता हूँ, एक आत्मविश्वास जागृत हो जाता है। खुद पर भरोसा कायम हो जाता है। अटल जी की कविता ढाढस बंधा देती है, मार्गदर्शन करती है।