क्या कहती है मधुबाला? हरिवंश राय बच्चन जी के गीत काव्य मधुबाला की समीक्षा प्रस्तुत कर रहा हूँ। अपने आप को धन्य समझता हूँ कि मैं इतनी महत्वपूर्ण काव्य रचना की समीक्षा अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर पा रहा हूँ। 

यकीन मानिए बच्चन साहब की इस रचना ने मुझे सम्मोहित कर लिया है। क्या कहती है मधुबाला? 

दूर स्थित स्वर्गों की छाया
से विश्व गया है बहलाया
हम क्यों उन पर विश्वास करें
जब देखा नहीं कोई आया
- 'मधुबाला' - हरिवंश राय बच्चन

वाह! वाकई बहुत खूब। मधुबाला, मधुशाला, मधु पिलाने वाला, मधु पीने वाला, मधु की सुराही, मधु का प्याला और खुद मधु –  इन सब के माध्यम से, इनको रूपक बनाकर बच्चन साहब ने जीवन का दर्शन प्रस्तुत किया है। 

और यह समझने के लिए मैंने उनका यह गीत काव्य ‘मधुबाला’ पहले एक बार पढ़ा, फिर दूसरी बार, फिर तीसरी बार और अपनी पसंदीदा पंक्तियों को फिर बार-बार पढता रहा। आज जब इतनी बार पढ़ लिया है, उनकी कुछ पंक्तियाँ, कुछ छंद मुझे कंठस्थ हो गए हैं। मैंने उनके भीतर जाकर, गहरा, गहरा खोद कर, मैंने अलग-अलग अर्थ समझने का प्रयत्न किया है, समझा हूँ, समझाया हूँ। तब मुझे लगा कि अब मैं तैयार हूँ आपके सामने यह प्रस्तुत करने के लिए और आपसे यह अनुरोध करने के लिए। 

पहले, की अगर आपने अभी तक मधुबाला नहीं पढ़ी तो तुरंत जाइये, पढ़िए। एक बार नहीं, दो बार नहीं, तीन बार नहीं और जैसा बच्चन साहब ने खुद ही कहा है की कविता को आँखों से नहीं, मुख से पढ़नी है।  

और दूसरा अनुरोध ये की अगर आपने पढ़ रखी है तो कृपया अपने विचार हमसे साझा करें। क्या आपको वही समझ आया जो मैं समझा हूँ? क्या मैं वह समझा जो आप समझ रहे हैं और समझाना चाह रहे हैं? 

इस गीत काव्य को पढ़ने के बाद मधुबाला ने जीवन का एक बहुत ही गूढ़ सत्य कहा है। एक कविता से उसकी कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

बच्चन जी की मधुबाला कह रही है: 

यूट्यूब पर देखिये – मधुबाला की समीक्षा
"चाहे जितनी मैं दूँ हाला"

हाला मतलब की शराब या मधु।

"चाहे जितनी मैं दूँ हाला 
चाहे जितना तू पी प्याला
चाहे जितना बन मतवाला

सुन, भेद बताती हूं अंतिम
यह शांत नहीं होगी ज्वाला
मैं मधुशाला की मधुबाला।"
- 'मधुबाला' - हरिवंश राय बच्चन

वाह! कितना सत्य है इन पंक्तियों में जो मधु पिलाने वाली मधुबाला ने कहा है। जहाँ हर वर्ग के लोग जाते हैं – पढ़े-लिखे रसूखदार, बेरोज़गार, जीते हुए, हारे हुए, सफल, असफल। और उनको जीवन का यह दर्शन समझा रही है समाज की तिरस्कृत, मधु पिलाने वाली, मधुशाला की मधुबाला। 

बच्चन साहब की मधुबाला की कुछ और यह पंक्तियाँ हैं जो एक कवि होने के नाते मेरे दिल को छू गई हैं। 

"तुमने समझा मधुपान किया 
मैंने निज रक्त प्रदान किया
उर क्रंदन करता था मेरा
पर मुख से मैंने गान किया

मैंने पीड़ा को रूप दिया
जग समझा मैंने कविता की
मैं एक सुराही मदीरा की।"
- 'मधुबाला' - हरिवंश राय बच्चन

अब देखिए मधु की सुराही, एक मिट्टी की सुराही के माध्यम से कितनी गहरी बात कह दी बच्चन साहब ने। कितनी सरलता से कह दी और यही उनकी खासियत है। 

आप अलग-अलग स्थितियों में, परिस्थितियों में इन पंक्तियों का सच ढूंढ सकते हैं। ये सुराही, उसका त्याग और उसका दर्द फिर से एक रूपक हो गए। रिश्तों में आप देख सकते हैं। कैसे कोई पुरुष या स्त्री रिश्ता निभाने के लिए सारे कष्ट और तिरस्कार को हँसते – हँसते सह जाते हैं। लोग उनकी झूठी मुस्कराहट के पीछे का दर्द पढ़ नहीं पाते। 

फिर एक वो तबका है हमारे समाज में जिन्हें दबाया जा रहा है। जो ‘जी साहब’, ‘जी मालकिन’, ‘जी हुजूरी’ करके सेवा करते रहते हैं और चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लिए रहते हैं। उनका ‘उर क्रंदन कर रहा होता है’ पर ‘मुख पर उनके गान’ होता है। 

तो ‘मैंने पीड़ा को रूप दिया, जग समझा मैंने कविता की’ – एक सुराही के माध्यम से कितनी गहरी बात कह दी बच्चन साहब ने। 

यही उनकी खासियत है। ऐसी बहुत सारी पंक्तियाँ हैं, बहुत सारे छंद हैं जिनके अर्थ बहुत गहरे हैं। तो यहाँ पर मधुशाला, मधुबाला एक रूपक है। तो जब आप पहली बार पढ़िए, आप मधुशाला के और मधुबाला के नशे में सरोबार हो जाइए, खो जाइये। फिर दूसरी बार पढ़िए, तीसरी बार पढ़िए और इन्हें एक रूपक समझिये, एक मेटाफोर समझिए और जीवन के दर्शन, जीवन के सत्य से मुलाकात कीजिये। सीखिए, सिखाइये, पढ़िए, सुनाइए – यह है इस काव्य रचना की खूबी। 


मधुबाला – गीत काव्य का पहला संस्करण १९३६ में प्रकाशित हुआ 

यह गीत-काव्य हरिवंश राय बच्चन ने लिखी थी १९३४-३५ में। १९३६ में इसका पहला संस्करण प्रकाशित हुआ था। आज ९० वर्ष के बाद भी उनकी यह रचना, इसका यह सत्य, इसका भावार्थ आज भी उतना ही सच है जितना १९३४-३५ में रहा होगा। और यकीनन आज से ९० वर्षों बाद भी और उसके बहुत बाद भी यह इतना ही सत्य रहेगा। 

यह है इस गीत काव्य की सबसे बड़ी सफलता और बच्चन साहब की महानता। तो ज़रूर पढ़िए। पढ़कर लोगों को सुनाइए और बच्चन साहब का अनुरोध या उनका आदेश – जो कहे स्वीकार कीजिए। आँखों से नहीं, मुख से पढ़िए बच्चन साहब की मधुबाला को। 

उन्होंने यह भी कहा है कि पहले मधुशाला पढ़िए, फिर मधुबाला पढ़िए। उनका आदेश तो सर आँखों पर। तो पढ़िए और अपने विचार हमसे साझा कीजिए। आज यहीं पर विराम लेता हूँ। बच्चन साहब को और आपको मेरा प्रणाम। 


हरिवंश राय बच्चन – एक संछिप्त परिचय 

हरिवंशराय बच्चन का असली नाम हरिवंशराय था, लेकिन प्यार से उन्हें ‘बच्चन‘ कहा जाता था और इसी नाम से वे पूरी दुनिया में मशहूर हुए।  उनका जन्म २७ नवंबर १९०७ को इलाहाबाद (अब प्रयागराज), उत्तर प्रदेश में हुआ था।  हिंदी साहित्य में उन्होंने अपनी खास पहचान बनाई और ‘हालावाद‘ काव्यधारा के वो एक प्रमुख कवि थे। 

उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया और वहीं पढ़ाना भी शुरू किया। बाद में, उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से विलियम बटलर येट्स के साहित्य पर रिसर्च की। भारत लौटने के बाद उन्होंने आकाशवाणी में काम किया और फिर विदेश मंत्रालय में ‘हिंदी विशेषाधिकारी’ भी रहे। १९६६ में, उन्हें राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा का सदस्य भी बनाया गया। 

बच्चन जी की कविता लिखने की शुरुआत बचपन में ही हो गई थी। १९३५ में उनकी कालजयी रचना ‘मधुशाला’ ने उन्हें घर-घर तक पहुँचा दिया। वे मधुशाला के पर्याय बन गए और उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि प्रेमचंद जैसे बड़े लेखक भी मानते थे कि अगर कोई हिंदी कवि मद्रास में भी जाना जाता है, तो वो बच्चन हैं। ‘मधुशाला’ के अलावा, उन्होंने दो दर्जन से ज़्यादा काव्य-संग्रह लिखे, जिनमें ‘मधुबाला’, ‘मधुकलश’, और ‘निशा निमंत्रण’ जैसी रचनाएँ शामिल हैं। 

कविताओं के साथ-साथ, उन्होंने अपनी आत्मकथा भी लिखी, जो चार हिस्सों में है: ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’, और ‘दशद्वार से सोपान तक’ । उन्होंने कई किताबों का अनुवाद भी किया और बच्चों के लिए भी लिखा। 

उन्हें साहित्य में उनके बेहतरीन योगदान के लिए कई बड़े पुरस्कार मिले। उन्हें पद्म भूषण (१९७६) और साहित्य अकादेमी पुरस्कार (उनकी रचना ‘दो चट्टानें’ के लिए) से सम्मानित किया गया. उनकी आत्मकथा के लिए उन्हें सरस्वती सम्मान भी मिला। 

१८ जनवरी २००३ को मुंबई, महाराष्ट्र में उन्होंने आखिरी साँस ली, लेकिन उनकी रचनाएँ आज भी हमें प्रेरित करती हैं और हमेशा जीवित रहेंगी। वे हिंदी साहित्य के एक ऐसे स्तंभ हैं, जिनकी जगह कोई नहीं ले सकता।


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