यह हिंदी पत्रिका सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि वर्तमान हिंदी साहित्य की नयी धड़कन है। हमारी कोशिश है हिंदी साहित्य जगत की उभरती प्रतिभाओं को एक मंच प्रदान करने की। आप तक चुनिंदा रचनाकारों को पहुँचाने की हमारी इस मुहीम में हमारा साथ दीजिये।
कहानियों, कविताओं, निबंधों और समीक्षाओं के माध्यम से हम हर महीने हिंदी साहित्य की नयी रचनायें आप तक पहुँचायेंगे। यहाँ आपको स्थापित लेखकों के साथ-साथ नए लिखने वालों को पढ़ने का अवसर मिलेगा।
अगर आप हिंदी साहित्य की दुनिया से जुड़े रहना चाहते हैं तो ‘प्रतिज्ञान’ आपके लिए है। हमें आपका साथ चाहिए और हम निरंतर, हर महीने और भी बेहतर अंक प्रकाशित करते रहेंगे। इस हफर में हमारे साथ जुड़ने के लिए हम और सभी लिखने वाले आपके आभारी हैं।
प्रतिज्ञान: वार्षिक संचयन – साहित्य, सृजन और संवेदनाओं का संगम

‘प्रतिज्ञान’ हिंदी साहित्य की वह अविरल धारा है जिसने अपनी डिजिटल उपस्थिति से पाठकों के दिलों में एक विशेष स्थान बनाया है। अमेज़न किंडल पर मासिक ई-पुस्तकों की सफलता के बाद, हम अपने पाठकों के लिए लेकर आए हैं यह विशेष ‘वार्षिक संचयन’ अब पेपरबैक के रूप में।
प्रतिज्ञान : अंक ११ (विशेषांक – अतृप्त भूख)

हिंदी मासिक पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ के इस ग्यारहवें अंक का आवरण विशेष है ‘अतृप्त भूख।’ इस अंक में साहित्य, सामाजिक चेतना और वैचारिक विमर्श का बेहतरीन संगम है। पढ़ें पेट की भूख से लेकर अहंकार और लालच की अंधी दौड़ पर तीखा प्रहार।
आज ही अपनी डिजिटल प्रति डाउनलोड करें और इस साहित्यिक वैचारिक महायज्ञ का हिस्सा बनें!
प्रतिज्ञान अंक १० | आवरण विशेष : अटूट, निःस्वार्थ प्रेम हिंदी पत्रिका

अपनी सीमित समझ की मार्फ़त आपसे बस ये विश्वास के साथ कहूँगा कि प्रेम में समर्पण ज़रूरी है। यदि समर्पण नहीं है, यदि समर्पण की कोई शर्त है तो प्रेम नहीं है। प्रेम कहानी अधूरी हो सकती है, प्रेम नहीं। प्रेम या तो पूर्ण है या नहीं है। इन कहानियों और कविताओं में किरदारों को पढ़ते समय मैंने यही समर्पण तलाशने की कोशिश की है। आप भी करें। वर्तमान में फैली अराजकता, अविश्वास और अशांति का एक समाधान है। प्रेम। साहित्य का दायित्व है प्रेम की अनुभूति और संभावनाओं को जीवित रखना।
प्रतिज्ञान का यह अंक एक ऐसा ही खूबसूरत प्रयास है।
अमेज़न किंडल पर पढ़ें प्रतिज्ञान का दसवां अंक।
प्रतिज्ञान अंक ९ | आवरण विशेष : मौसम (ऋतु, रूपक और विमर्श)

समकालीन हिंदी साहित्य की अनवरत यात्रा में ‘प्रतिज्ञान’ का यह नौवां अंक (मई २०२६) अपने पाठकों के लिए एक बेहद विचारोत्तेजक और गहरा विमर्श लेकर आया है। इस महीने का आवरण विशेष है ‘मौसम’। लेकिन यहाँ मौसम महज़ कैलेंडर की बदलती ऋतुओं या चिलचिलाती धूप का नाम नहीं है; यहाँ मौसम एक रूपक है, इंसानी फितरत का आईना है, और समाज के बदलते मिज़ाज का मनोवैज्ञानिक दस्तावेज़ है।
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प्रतिज्ञान अंक ८ | मातृत्व – पूर्णता या बोझ

मातृत्व एक वरदान है। एक ज़िम्मेदारी है। किन्तु इस वरदान, इस ज़िम्मेदारी को हर स्त्री के लिए अनिवार्य किसने बनाया? किस अधिकार से? अगर कोई स्त्री इस वरदान से वंचित रह जाए तो क्या उसके नारीत्व पर सवाल उठाये जाने चाहिए? यदि कोई स्त्री इस ज़िम्मेदारी का निर्वहन न करने का निर्णय ले, तो क्या उसके चरित्र पर सवाल और दोषारोपण करना सही है?
अपनी कोख में एक संतान को शरण देने का फैसला एक स्त्री का अकेले का क्यों नहीं? क्या समाज ने एक बाँझ स्त्री और एक नपुंसक पुरुष को समान दृष्टि से देखा?
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प्रतिज्ञान अंक ७ | सामाजिक विमर्श

क्या आपने कभी समाज की संरचना पर सवाल किया है?
‘प्रतिज्ञान’ का सातवां अंक (मार्च 2026) साहित्य के माध्यम से उन्हीं अनुत्तरित सवालों को टटोलने की एक गंभीर कोशिश है। आज के दौर में जहाँ 20 सेकंड की रील जीवन पर हावी है, यह अंक आपको ठहरने, सोचने और विमर्श करने का आमंत्रण देता है।
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प्रतिज्ञान अंक 6 – प्रेम के अनछुए आयाम

‘प्रतिज्ञान – अंक 6’ के साथ प्रेम के अनछुए आयामों को जानें। मुख्यधारा की रूमानी कहानियों से परे, 7 कहानियों और 18 कविताओं का एक अनूठा संग्रह जो मानवीय संबंधों की जटिल और सच्ची परतों को उधेड़ता है।
प्रतिज्ञान का चौथा अंक – रोमांच और अलौकिक किस्सों का तड़का

हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ में पहली बार, हम कदम रख रहे हैं अलौकिक दुनिया में। रोंगटे खड़े कर देने वाले थ्रिलर से लेकर अनसुलझे रहस्यों तक। क्या आप शब्दों के पीछे छिपे इस सच को पढ़ने के लिए तैयार हैं?
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प्रतिज्ञान का तीसरा अंक – कहानियाँ, कवितायेँ, समीक्षा, शायरी

आप सभी के सहयोग से हमारी हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ का तीसरा अंक तैयार है। आप इसे अभी अमेज़न से खरीद सकते हैं। पढ़ें सनसनीखेज कहानियाँ, विचारोत्तेजक कवितायेँ, महिला साहित्यकारों पर हमारी ख़ास पेशकश, ‘गुनाहों का देवता’ उपन्यास की गहन समीक्षा और बहुत कुछ।
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