‘प्रतिज्ञान – अंक 6’ के साथ प्रेम के अनछुए आयामों को जानें। मुख्यधारा की रूमानी कहानियों से परे, 7 कहानियों और 18 कविताओं का एक अनूठा संग्रह जो मानवीय संबंधों की जटिल और सच्ची परतों को उधेड़ता है। अमेज़न किंडल पर अभी उपलब्ध।

प्रतिज्ञान – अंक ६ (प्रेम विशेषांक)

क्या प्रेम केवल एक उत्सव है, या यह अस्तित्व के लिए किया जाने वाला एक मूक संघर्ष है?

इस फरवरी, प्रतिज्ञान’ आपको गुलाबों और मीठी बातों के शोर से दूर ले जाने के लिए तैयार है। हमारे इस पहले ‘थीम-बेस्ड’ (विषय-आधारित) अंक में, हम मानवीय हृदय के उन गुप्त कोनों में झाँक रहे हैं जहाँ अक्सर रोशनी नहीं पहुँच पाती। यहाँ प्रेम केवल एक मिलन नहीं, बल्कि एक कच्चा ‘अनुभव’ और एक ‘परिधि’ है, जिसे अक्सर सन्नाटे, त्याग और संघर्ष से गढ़ा जाता है।

एक शांत पोखर के दार्शनिक सुकून से लेकर जेल की कोठरी की हिंसक सीमाओं तक, अंक 6 उन आवाज़ों का संग्रह है जो प्रेम और विरह की परिभाषा को नए सिरे से लिखती हैं।

इस अंक के मुख्य आकर्षण:

  • संपादकीय: शहर के कोलाहल से दूर एक यात्रा, जहाँ आप जानेंगे कि एक केंचुए का मिट्टी को सींचना भी प्रेम का उतना ही बड़ा रूप है जितना एक तितली की उड़ान।
  • 7 मर्मस्पर्शी कहानियाँ: मानवीय संवेदनाओं के जटिल ताने-बाने को बुनती कहानियाँ, चाहे वह ‘दहलीज़’ की टीस भरी चुप्पी हो या ‘परिधि’ का रोंगटे खड़े कर देने वाला जुनून।
  • 19 कविताएँ: इंतज़ार की सिलवटों, सामाजिक बेड़ियों और समय के साथ बदलती भावनाओं का एक लयबद्ध अन्वेषण।

मुख्यधारा से अलग

यदि आप ऐसी साहित्यिक कृति की तलाश में हैं जो ‘सुखद अंत’ के दावों से परे यथार्थ की कड़वाहट और संवेदना की गहराई को समेटे हुए हो, तो यह अंक खास आपके लिए है। प्रेम के उस ‘शून्य’ का अनुभव करें जो शब्दों की सीमा से परे है।


प्रतिज्ञान अंक 6 के रचनाकार

सम्पादक : नितेश मोहन वर्मा
सह-सम्पादक : शिव कुमार शर्मा

अनीता क्वात्रा, एक संवेदनशील रचनाकार, जीवन की कोमल भावनाओं को शब्दों में ढालने का अद्भुत हुनर रखती हैं। पंजाब के पटियाला में जन्मीं अनीता बचपन से ही भाषा, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं की गहराई से जुड़ी रही हैं। विवाह के बाद उन्होंने हरियाणा को अपना घर बनाया, जहाँ वे अपने पंजाब की मिट्टी, बोलियों और परंपराओं को दिल में सहेजे हुए, बच्चों को पंजाबी भाषा सिखाने का निष्ठापूर्ण कार्य भी करती हैं। उनकी शिक्षा भले ही ग्रेजुएशन तक सीमित हो, पर उनकी वास्तविक विद्या उनके अनुभवों, संवेदनाओं और जीवन के उतार–चढ़ाव में निहित है। इसीलिए उनकी रचनाओं में चकाचौंध नहीं बल्कि सच्चाई, आत्मीयता और स्त्री-मन की गहराई से जन्मा एक मार्मिक यथार्थ मिलता है।

आशिष कुमार उर्फ़ ‘शैंकी’ झारखंड के रामगढ़ के रहने वाले हैं। उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में अपनी शिक्षा पूरी की है। जीवन के अनुभवों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया है। उनका मानना है कि जिंदगी जितना रुलाती है, मौत उतना ही तड़पाती है। वे संसार की विडंबना को बखूबी समझते हैं कि दुनिया अभाव पर हँसती है और संपन्नता पर जलती है, लेकिन उनके पास जो है, उसे वे एक ऐसी अनमोल विरासत मानते हैं जिसके लिए दुनिया तरसती है। आशिष खुद को पूरी तरह महादेव के चरणों में समर्पित मानते हैं। उनका कहना है कि वे अपने बारे में क्या कहें, उनके व्यक्तित्व के रंग तो समय के साथ धीरे-धीरे सबके सामने खुद-ब-खुद उजागर होंगे।

पटना के युवा आसिफ, अपनी कलम से कहानियों में जान भर देते हैं। पेशे से एक अकाउंटेंट, आसिफ दिन भर संख्याओं की दुनिया में खोए रहते हैं, लेकिन शाम होते ही उनका दिल शब्दों की गलियों में निकल पड़ता है। उन्हें फुर्सत के पल में उर्दू शायरी और ग़ज़लें पढ़ना बेहद पसंद है, जिसकी झलक उनकी कहानियों में साफ दिखती है।

आशीष पेशे से एक चिकित्सक और चिकित्सा अनुसंधान विशेषज्ञ हैं। वह कहानी और कविताएँ लिखते हैं तथा चित्रकारी में भी रुचि रखते हैं। आशीष चार समलैंगिक रोमांस उपन्यासों और विभिन्न एलजीबीटीक्यू पात्रों वाली एक सात लघु कहानियों के संकलन के प्रकाशित लेखक हैं। उन्होंने एक रोमांटिक सस्पेंस उपन्यास भी प्रकाशित किया है। उन्होंने पोएट्री वर्ल्ड ऑर्ग द्वारा प्रकाशित बच्चों के संकलन व्हिम्सिकल टेल्स ऑफ व्हिस्कर्स एंड वंडर्स में भी योगदान दिया है। अपनी एलजीबीटीक्यू कहानियों के माध्यम से, आशीष ने संवेदनशील सामुदायिक विषयों को खुली चर्चा में लाने का प्रयास किया है, चाहे वो पारिवारिक अस्वीकृति हो, या सामाजिक बहिष्कार हो। वाणिज्यिक रोमांस कथाओं का उपयोग करते हुए, उन्होंने अपने पात्रों के माध्यम से सामाजिक विरोधाभास को प्रदर्शित किया है कि कैसे ये एक व्यक्ति को प्रभावित करती है और कैसे उनकी आशाएं, आकांक्षाएं और इच्छाएं विषमलैंगिक दुनिया से अलग नहीं हैं।

इनका जन्म पंजाब राज्य के एक गाँव में हुआ था। इन्होंने पंजाब विश्वद्यालय, चंडीगढ़ से ही उच्च शिक्षा ग्रहण की है। यह लगभग २० वर्षों से रुचि के अनुरूप लिख रही हैं। पहली रचना का सृजन २००४ में किया था। अब तक यह ५०० से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं और इनके अनुसार लेखन एक ज़िम्मेदारी से भरा हुआ रचनात्मक कार्य है। भारत में यह पेशे से हिन्दी अध्यापिका रही हैं। आजकल यह कैनेडा का स्थाई आवास प्राप्त करके वहीं बस चुकी हैं। इनके मनपसंद लेखक मुंशी प्रेमचंद व महादेवी वर्मा हैं, जिनके उपन्यास और काव्य-रचनायें अधिक पसंद हैं। इन्हें स्वयं कविता, कहानी, व्यंग्यात्मक लेख लिखना अधिक पसंद है। यह पंजाबी व हिन्दी भाषाओं में रचनाओं का सृजन करती हैं अब तक इनके ७७ के लगभग साँझा काव्य संकलन प्रकाशित हो चुके हैं।

कल्पना पांडेय एक लेखिका और कवयित्री हैं। उनकी शिक्षा में कला स्नातक, अंग्रेजी साहित्य और मास कम्युनिकेशन में स्नातकोत्तर और सॉफ्टवेयर प्रोग्रामिंग और प्रौद्योगिकी की शिक्षा भी शामिल है। वे आरपीकेबी इंफोटेक एलएलपी की निदेशक भी है। कल्पना पांडेय की लेखन यात्रा किशोरावस्था से ही शुरू हुई, जब उन्होंने कविता और भजन लिखना शुरू किया। उन्होंने ब्लॉगर, इंस्टामीडिया, और योरकोट पर अपनी रचनाएं प्रकाशित की है। उनकी कविताएं और कोट्स हिंदी और अंग्रेजी में लिखे गए है, और वे इंस्टाग्राम पर एक ब्लॉगर के रूप में सक्रिय है। कल्पना पांडेय की रचनाएं कई काव्य संकलनों और अखबारों में प्रकाशित हुई हैं।

कनक एक गृहिणी हैं जो आगरा में निवास करती हैं। वह अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ, जीवन की जटिलताओं को शब्दों के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करती हैं। उनका मानना है कि मानव जीवन में प्रेम सर्वोपरि है और यही वह माध्यम है जो सभी विषमताओं और वैमनस्यताओं को समाप्त करने की शक्ति रखता है। इसी कारण, प्रेम उनका पसंदीदा विषय है, जिसे वह अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास करती हैं। वह चाहती हैं कि संसार के सारे विभेद समाप्त हो जाएँ और पूरा संसार प्रेममय हो जाए।

कौस्तुभ मुंबई के साकिन है। महाराष्ट्र के नागपुर शहर में पले-बढ़े और बचपन ही से शा’इरी में दिलचस्पी रही। आई. आई. टी. गांधीनगर में यांत्रिकी अभियांत्रिकी की शिक्षा प्राप्त करते हुए, प्रो. हमीदा बनो-चोपड़ा (हमीदा आपा) से उर्दू शा’इरी और लिपि की तालीम हासिल की। आज रसायनों के ख़रीद-ओ-फ़रोख़्त के मशग़ले के साथ-साथ उर्दू और खड़ी-बोली में ग़ज़ल, नज़्म और कविताएं कहते-लिखते हैं। तरक़्क़ी-पसंद और क्लासिकी उर्दू शा’इरी का ख़ासा प्रभाव रहा है। आपकी तहरीर में सामाजिक परिस्थितियों और, इंसानी हालात और फ़ितरत पर राय-ज़नी झलकेगी। शा’इरी के अलावा मौसीक़ी और आबी रंग मुसव्विरी में भी विशेष रूचि रखते हैं। आप के द्वारा रचित गीत सभी प्रसिद्ध म्यूज़िक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध हैं।

मीनल गुप्ता गुजरात की रहने वाली एक ३५ वर्षीय स्वास्थ्य सेवा पेशेवर हैं। उनकी मुख्य रुचियाँ चित्रकला और अकादमिक लेखों के अध्ययन में रही हैं, लेकिन लेखन उनके जीवन में एक नए अनुराग के रूप में उभरा है। वे लेखन को जीवन के लिए एक उपचारात्मक माध्यम मानती हैं। मीनल का यह संकल्प है कि वे अपने शब्दों के माध्यम से पाठकों के दिलों को स्पर्श करें। उनके कुछ लेख पहले ही विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और ई-पुस्तकों में प्रकाशित हो चुके हैं।

नितेश मोहन वर्मा ‘प्रतिज्ञान‘ के संस्थापक और प्रधान संपादक हैं। ‘प्रतिज्ञान’ एक मासिक हिंदी साहित्यिक पत्रिका है जिसका उद्देश्य समकालीन साहित्य में मौलिक और लीक से हटकर आवाज़ों को मंच प्रदान करना है। स्वयं एक कथाकार और कवि, नितेश की रचनाएँ मानवीय भावनाओं के गहरे और अनछुए हिस्सों को टटोलती हैं। उनकी लेखनी में सामाजिक विमर्श, व्यक्तिगत पहचान और यथार्थ का कच्चा रूप साफ झलकता है। ‘प्रतिज्ञान’ के माध्यम से वे एक ऐसा मंच बनाना चाहते हैं जहाँ साहित्य केवल मनोरंजन न हो, बल्कि सतह के नीचे छिपे सच को सामने लाने का साहस रखे।

पिंकी जी साहित्य और कला के प्रति गहरा अनुराग रखने वाली एक समर्पित लेखिका हैं, जो गृहणी के रूप में अपने दायित्वों के साथ-साथ रचनात्मकता के संसार में सक्रिय हैं। दिल्ली में जन्मीं और स्नातक की शिक्षा प्राप्त करने वाली पिंकी, वर्तमान में उत्तराखंड के नैनीताल जिले की शांत और प्राकृतिक वादियों में रहती हैं। उनका लेखन, जीवन के सूक्ष्म अनुभवों और साहित्यिक संवेदनाओं का एक सुंदर समन्वय है। पठन और लेखन के प्रति उनका गहन शौक उन्हें कला और साहित्य की दुनिया से जोड़ता है। उनकी विचारशील और आत्मीय रचनाएँ देश के कई प्रतिष्ठित किताबों और समाचार पत्रों में सफलतापूर्वक प्रकाशित हो चुकी हैं।

झांसी, उत्तर प्रदेश में पली बढ़ी पूजा शुक्ला पेशे से एक बैंकर हैं जो मुंबई में कार्यरत हैं, और निजी जिंदगी में वो एक शांत और अंतर्मुखी स्वभाव रखती हैं, जो बोलती कम हैं और महसूस ज्यादा कर पाती हैं। ज़िंदगी में आए कुछ निजी हादसों ने उसका रुख कविताओं की तरफ मोड़ दिया। दर्द ने जब उसे घेरा, तो उसने दुनिया से नहीं, बल्कि लफ़्ज़ों से दोस्ती कर ली। वो ज़्यादातर तन्हाई, खालीपन, उदासी, और टूटे दिलों पर लिखती है। उसे लगता है कि इन भावों पर लोग कम बात करते हैं, और इन पर ज्यादा बात होनी चाहिए।

डॉ. रेखा रानी लंबे समय से हिंदी लेखन में सक्रिय हैं। उन्होंने नालंदा ओपन विश्वविद्यालय के लिए अध्ययन-सामग्री तैयार की है। इसके अलावा, उन्होंने मगधी कविताओं का हिंदी रूपांतरण और एक शोध-स्तरीय पुस्तक का अनुवाद भी किया है। भारत सरकार द्वारा आयोजित हिंदी निबंध प्रतियोगिता में उन्हें तृतीय स्थान प्राप्त हुआ है। उनकी कई पुस्तकें व काव्य-संग्रह अमेज़न पर उपलब्ध हैं। वह एक लेखिका, मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता और पूर्व प्रोफेसर (मनोविज्ञान) हैं।

उत्तराखंड के देहरादून की निवासी सविता कोटनाला एक लेखिका और शिक्षाविद हैं। स्नातक तक शिक्षित सविता ने कंप्यूटर शिक्षिका के रूप में अपनी सेवाएँ दी हैं और वर्तमान में एक कुशल गृहिणी के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में भी सक्रिय हैं। सविता अब तक कई पुस्तकों में ‘सह-लेखिका’ के रूप में अपना योगदान दे चुकी हैं। लेखन के साथ-साथ वे ओपन माइक और मुशायरों के मंचों पर भी अपनी रचनात्मक उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं। उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने निजी मनोभावों, सामाजिक परिवेश और अपने आसपास के लोगों के अनुभवों को बेहद संजीदगी के साथ शब्दों में ढालने का प्रयास करती हैं।

मुंबई निवासी शिव आधुनिक युग के उन विरल रचनाकारों में से हैं जो अपने आईटी पेशेवर जीवन के साथ-साथ एक संवेदनशील कवि और चिंतक की भूमिका निभाते हैं। वे तकनीक और भारतीय परंपरा के बीच एक सजीव सेतु रचते हैं। शिव की लेखनी में रामचरितमानस, संत कवियों के दोहों और मानव अनुभवों की सूक्ष्म संवेदनाएँ सहजता से मिलती हैं। उनका लक्ष्य है कि शब्दों के माध्यम से वे भी आने वाली पीढ़ी के लिए ज्ञान के अनमोल रतन छोड़ जाएँ, ठीक उसी तरह जैसे हमारे पुराने ऋषियों और कवियों ने किया था। आप प्रतिज्ञान प्रकाशन के सह-सम्पादक हैं।

शिवनाथ आधुनिक हिन्दी वृक्ष की वो नवीन कोपल हैं, जो इस वृक्ष की सघन छांव और कविताओं के आलिंगन में स्वयं को सजीव महसूस करते हैं। इनकी कविताएँ स्मृतियों, टूटन और मन के उथल–पुथल से फूटती हैं। वे भावनाओं को सजाते नहीं, बल्कि उन्हें कच्ची ईमानदारी से शब्दों में उतारते हैं। उनकी कविताएँ सीधे हृदय में उतरती हैं, कभी उदास, कभी बेचैन, लेकिन सदैव गहरी और अविस्मरणीय। वे मन की चुप्पियों और हृदय की कसक को शब्दों के जरिए कविताओं में बांधते हैं। शिवनाथ कविताओं को लिखने से ज्यादा उन्हें जीना पसंद करते हैं।

सोनी जी ने ह्यूमैनिटीज़ में पीएचडी की है और इंश्योरेंस और रिस्क मैनेजमेंट में मास्टर्स डिग्री हासिल की है। उन्हें पढ़ने और लिखने का बहुत शौक है। वो आम लोगों की ज़िंदगी और उनसे जुड़ी सच्ची कहानियों पर अपने विचार और कहानियाँ लिखना पसंद करती हैं।

सुषमा एक नवोदित कवयित्री हैं, जो छंदों (कविता) के माध्यम से जीवन और भावनाओं की जटिलताओं को तलाश रही हैं। शब्दों और कहानियों के प्रति जुनून के साथ, उनका उद्देश्य लेखन के द्वारा पाठकों से जुड़ना है। यह उनका पहला प्रकाशित कार्य है।

तेजस्विनी एक संवेदनशील लेखिका, कवयित्री और कहानीकार हैं। उन्हें शब्दों के माध्यम से भावनाओं, रिश्तों और जीवन के सूक्ष्म अनुभवों को अभिव्यक्त करना पसंद है। उनकी रचनाओं में प्रेम, आत्मचिंतन, स्त्री मन, सामाजिक यथार्थ और आध्यात्मिक अनुभूतियों की झलक मिलती है। लेखन उनके लिए केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्मसंवाद और आत्मखोज का माध्यम है। वर्तमान में वे कहानियाँ, कविताएँ, गीत और ब्लॉग लेखन में सक्रिय हैं तथा साहित्य और सृजनात्मक लेखन के क्षेत्र में निरंतर सीखने और प्रयोग करने में विश्वास रखती हैं।


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