शहज़ाद अहमद साहब ने क्या खूब कहा है – 

“हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब
ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया”

कभी मजबूरी, कभी फितरत और कभी साजिश। इंसान कई चेहरे लगाता है। हमने ‘प्रतिज्ञान’ परिवार के सदस्यों से आग्रह किया की ‘मुखौटा’ शब्द पर अपने ख़याल लिख कर भेजें। शायरी या कविता।

Hindi Poetry Prompt - Mukhauta

हिंदी कविता प्रॉम्प्ट ‘मुखौटा’ – रचनाकारों की सूची 

नीता सेलौनी – मुखौटा

उसने सुना था कहीं
कैंची की तरह नहीं,
सुई की तरह बनो।

फिर भी उसने जानते-बूझते
कैंची बनना स्वीकारा,
और जाते ही परिवार को विभाजित कर दिया।

आसान रास्ता चुना।
सुई की तरह जोड़ने का
चुनौतीपूर्ण काम
क्यों करती भला वो?

पति के प्यार को ढाल बनाकर
दुनिया को फरेब दिखाती,
रोज नए त्रियाचरित्र से
सबको चौंकाती।

कठपुतली-सा बेबस पति
सब कुछ जानते हुए भी सहता,
और ‘सब सामान्य है’ ऐसा
मुखौटा धारण करता।

मानो खुद के फैलाए रायते में
रोज खुद ही फिसलता।

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कनक अग्रवाल – काश

अपने ज़ख्मों को कपड़ों से छुपा
अपनी सिसकियों को सीने में दफन कर

खूंटी पर टंगा मुस्कराता मुखौटा
चस्पा किया उसने अपने चेहरे पर
और कदम रखा पार्टी हॉल में..

हर तरफ मुस्कुराते चेहरे
थिरकते कदम मना रहे थे जश्न..

आज जश्न का दिन था..!!

राष्ट्रीय पुरुस्कार जो मिला था
उसके पति की संस्था को
नारी उत्थान और उनके हित के लिए..

काश..!!
कि कोई देख पाता..

मुखौटे के पीछे छुपे उस असली चेहरे को..

जो पहना था उसने
छुपाने को असलियत अपने ही पति की…!!

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सोनिका शर्मा – मुखौटा

ये हकीकत है कोई ख़्वाब नहीं
बदलते मुखौटो का हिसाब नहीं

कोशिश पहचानने की है जारी
इरादा मेरा कोई खराब नहीं

कौन सा असली, कौन सा नकली
मिल पाया अभी ये जवाब नहीं

फूलों सी हंसी सभी मुखौटों पर
सच्ची खुशी वाला कोई गुलाब नहीं

नशे में डूबा है यहां हर मुखौटा
हर नशे का पर नाम शराब नहीं

हवा से तेज रफ्तार यहां बदलने की
बदलने के लिए जरूरी नकाब नहीं

बदलता रहा गिरगिट भी रंग हजार
मगर मिला उसे भी खिताब नहीं

कहाँ से सीखूं पहचान मुखौटों की
ढूंढने पर भी मिली ऐसी किताब नहीं

मुखौटो की दुनिया से दूर दुनिया मेरी,
बदलने की फितरत मेरी जनाब नहीं

मुबारक ये मुखौटे झूठे दिखावे को
मुखौटे पे मुखौटों का हिसाब नहीं।

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प्रतिभा सिंह – मुखौटा

इस धरा पर चेहरे पर चेहरे बदलते हैं लोग
ना जानें क्यूँ थोड़े से यश के लिए
रोज नए मुखौटे लगाते है लोग

जीवन भर एक नकली दुनिया में रहते हैं लोग
अपने असली रूप को छुपाकर
सच्चाई को दबाकर, झूठ की दुनिया में जीते हैं लोग

मुखौटा पहनकर चलते हैं लोग
असली चेहरा नहीं दिखाते
कभी खुशी तो कभी गम को छुपाते हैं लोग

मुखौटा पहनकर लड़ते हैं लोग
दिल में वर्षों से दुश्मनी लिए
सामने सीने से लगाते हैं लोग

मुखौटा पहनकर जीते हैं लोग
डरते हैं अपने सपनों से
दिल की बात दिल में ही छुपाते हैं लोग

मुखौटा पहनकर रोते हैं लोग
अपने आँसुओं को नहीं दिखाते
असली दर्द को दिल में ही दबाते हैं लोग

मुखौटा है जीवन का एक हिस्सा
हम सब हैं एक अभिनेता
जिसमें अपना -अपना रोल निभाते हैं लोग।

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जतिन अशोक – क्या मुखौटों से लड़ा जा सकता है?

अनगिनत चेहरों में हैं
न जाने कितने ही और अनगिनत चेहरे
चेहरे, जो होते अलग हैं
और दिखते अलग।
कुछ वासना से भरे चेहरे
कुछ साधना में सधे चेहरे
कुछ प्रेम में पड़े चेहरे
कुछ बैर में दबे चेहरे।
सभी चेहरों के मिल जाने पर
मुखौटे जन्म लेते हैं
मुखौटे ऐसे, इंसानी चेहरे जैसे।
उनके बीच का अंतर
महज़ आत्मा को पता है
शरीर को नहीं
शरीर, मुखौटों की सच्चाई से बेख़बर है
दीवाल पर टंगा, धूल खाता शीशा भी
उसका साथ नहीं देता
क्या मुखौटों से लड़ा जा सकता है ?
क्या मुखौटों से लड़ना खुद से लड़ना नहीं है?

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पिंकी गिरी – चेहरे और मुखौटे

काश दिल में रहकर दिल के अंदर देख लेते
सच्चाई की गहराई का हम समुंदर देख लेते,

मन की जमीं पर गिरे एक बूँद इश्क़ कहीं
ये ख़्वाहिश से पहले झूठा अंबर देख लेते।

पिंकी जी की पूरी कविता हमारे आगामी काव्य संग्रह ‘मैं – सूक्ष्म, प्यासा, मुखौटा’ में प्रकाशित होगी। उनकी कविताओं के लिए उन्हें इंस्टाग्राम पर फॉलो करें।

सुषमा – मुखौटे का शहर

अजीब शहर है
हर शख़्स पर कोई न कोई मुखौटा है,
ये किसकी मौत का मातम है
जो सबने हँसकर ओढ़ा मुखौटा है

मैं अपने आप से मिलकर भी ख़ुद को पहचान न पाया,
ये किस बरस की तबाही है जो चेहरे पर जमता मुखौटा है
ये ख़ुदकशी-सी ख़ामोशी, ये साँसों की उदासी
यक़ीन मानिए दोस्तों,
मेरा सबसे बड़ा दुश्मन मुखौटा है।

सुषमा जी की पूरी कविता हमारे आगामी काव्य संग्रह ‘मैं – सूक्ष्म, प्यासा, मुखौटा’ में प्रकाशित होगी। उनकी कविताओं के लिए उन्हें इंस्टाग्राम पर फॉलो करें।

सलोनी खन्ना – अभिनय

चेहरों की दुनिया में हर कोई मुस्कुराता है,
पर भीतर कितना दर्द छिपाता है
ये किसी को कहाँ दिखाई देता है।

हम रोज़ सुबह आईने के सामने
एक नया मुखौटा पहन लेते हैं,
खुशियों का, हँसी का,
या मजबूरियों का
जो भी हालात हमसे मांग लेते हैं।

सच्चाई तो यह है कि
दिल थक चुका है यह अभिनय करते–करते,
पर समाज की अदालत में
बिना मुखौटे के कोई बरी नहीं होता।

कभी–कभी सोचता हूँ,
क्या होगा जिस दिन
हम बिना बनावट, बिना डर
अपने असली चेहरे में जी लेंगे?
क्या तब भी लोग
हमें उतना ही स्वीकारेंगे?

हर आँख के पीछे
एक दबी कहानी है,
हर मुस्कान के नीचे
टूटा हुआ एक निशान है।

ये मुखौटा बस एक ढाल है
दुनिया के तानों से बचने की,
अपनों के सवालों से बचने की,
और खुद को रोज़
थोड़ा–थोड़ा सँभालने की।

काश…
कभी तो ऐसा दिन आए
जब हमें मुखौटा पहनकर
जीना न पड़े,
जब हमारा सच
हमारी कमजोरी न बने।

तब शायद हम भी
बेझिझक कह पाएँगे
“हाँ… यही हूँ मैं,
बिना आडंबर, बिना छल
पूरी तरह,
पूरी सच्चाई के साथ।

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अनीता कवात्रा – मुखौटा

ज़माना मुझको हँसाता है, मैं रो नहीं सकती
ये दिल भी क्या अजब है
हर शिकायत कह नहीं सकती

मेरे चेहरे पे सजी मुस्कान भी इक पर्दा ही सही
वरना मैं अपनी तन्हाई
यूँ सबके सामने रख नहीं सकती

बहुत ग़ैरों ने समझा है मुझे आसाँ-सा पढ़ लेना
मगर ख़ामोशियों के अक्षर
यूँ हर दिल पढ़ नहीं सकता

मैं अपने दर्द को दामन में छुपाए यूँ ही फिरती हूँ
कि कोई मेरी नर्मी को
मेरी कमज़ोरी न समझ बैठे
मैं टूटकर भी
किसी की नज़रों में गिर नहीं सकती

मेरे आँसू भी कितने अदब से पलकों पर ठहरते हैं
जैसे इजाज़त माँग रहे हों
बहें या फिर ठहर जाएँ
और मैं?
मैं हर बूँद को चुपके से लौटा देती हूँ
क्योंकि मैं अपनी रानी-सी शान को
यूँ मिटने नहीं दे सकती

जहाँ दुनिया तमाशा ढूँढती है लोगों की रूह में
वहाँ मैं अपने ग़मों को भी
तहज़ीब की चादर ओढ़ा देती हूँ
कि कोई मेरी थकन को
मेरी हार का नाम न दे सके

नसीब ने चाहे जितने भी रंग मेरे हिस्से रखे हों
मैं हर आँसू में भी रौशन-सी नफ़ासत ढूँढ लेती हूँ
ये दिल भी अजीब है
टूटकर भी मुस्कुराहट की महफ़िल सजा देता है,
मैं औरत हूँ…
अपनी हयाबंद रूह को दुनिया में
यूँ बरहम नहीं कर सकती

मेरी मुस्कान कोई ख़ुशी नहीं
एक इबादत है,
जो मैं हर सुबह अपने जिगर के टूटे हिस्सों पर रखती हूँ
मुख़ोटा नहीं, एक दावा है मेरे अस्तित्व का,
कि मैं दर्द में भी अपनी शान की रोशनी कम नहीं करती

और दिल के भीतर
एक ख़ामोश समंदर है
जो सिर्फ़ खुदा जानता है
फिर भी मैं दुनिया की महफ़िल में
झूमर सी हँसती रहती हूँ…
क्योंकि मैं अपने ज़ख़्मों को
किसी की नज़रों में
सस्ता नहीं कर सकती।

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माया राठौड़ – मुखौटा

हर इंसान यहाँ न जाने कितने रूप लगाता है
मुस्कानो की ओट में अक्सर अपना दर्द छुपाता है

भीड़ में चलता है पर भीतर से कितना अकेला
अपने ही सच से लड़ता है पर दिखता है बड़ा अलबेला

कभी हँसी का मुखौटा पहनकर रोता है रातो में
कभी साहस का नकली चेहरा, टूटी हुई हालातो में

जो बोलता कम है वह भी दिल में तूफान दबा लेता है
जो हँसता खुलकर दिखता है, वह भी आँसू छुपा लेता हे

कौन जान पाएगा किसके दिल में कितना अँधेरा है
हर कोई अपने घावो को सिलता हुआ एक फेरा है

इंसान की असली सूरत तो तब दिखती है
जब वह खुद से हारकर अपने अंदर झाँकता है

जब सच का आईना सामने आकर खड़ा हो जाता है
भीतर छिपा हर डर अपनी आवाज़ उठा जाता है

इंसान फिर अपने चेहरे का बोझ उतरता महसूस करता है
एक पल को सही, पर खुद से मिलना भी आसान लगता है

मुकद्दर की धूप में जब मुखौटे पिघलने लगते हैं
तब असली दिल के रंग सामने खुलने लगते हैं

जो छलकता है आँखों में वही तो असली चेहरा है
बाकी तो सब दुनिया की चाह में आंखों पे पहरा है।

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हर्षा परमार

सादगी का लिबास था मेरा

उम्र के पड़ाव ने बेहया मुखौटे से सराहा

वक्त के बीते समय ने

अपशकुन, कुलक्षिणी के मुखौटे भी पहना दिए 

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मोहम्मद आफिफ – नकाब

ज़िन्दगी से हारे हुए लोगों को एक नई उम्मीद और एक ख्वाब की ज़रुरत है
बहुत बे-इल्म कायनात है ये इसे एक इल्म की किताब की ज़रुरत है

मिलना पड़ता है सबसे मुस्कुराते हुए चेहरे को एक नकाब की ज़रुरत है
हर दिलनशी को निगाहे बद से बचाना है ज़रूरी हर दिलरुबा को एक हिजाब की ज़रुरत है

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उत्कर्ष शर्मा

गलती से उन से प्यार कर बैठे
उन पर अपनी जान न्यौछावर कर बैठे
सोचा था कि सातों जन्म साथ रहेंगे हमारे
वो तो हमे इस जन्म में ही छोड़ बैठे
अब हमे देख कर मुंह छिपाया करते है
ना पहचान ले हम उन्हें इस लिए मुखौटा लगाए फिरते है
उस मुखौटे के पीछे किया है ये कोई नहीं जानता
उस मुखौटे ने हजारों घर तबाह करे है ये बात कोई नहीं मानता।

उत्कर्ष जी की कविताओं के लिए उन्हें इंस्टाग्राम पर फॉलो करें।

‘मुखौटा’ शब्द पर सभी ने अलग-अलग ख़याल प्रस्तुत किये हैं। कुछ कवितायेँ वाकई बेहतरीन हैं। आप ज़रूर बतायें की आपको कौन सी कविता सबसे अच्छी लगी। इस शब्द पर आप अपने ख़याल नीचे कमेंट्स में लिखें। 

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पढ़िए ‘मुखौटा’ प्रॉम्प्ट  पर बेहतरीन कवितायेँ। मुखौटा पर अकबर हैदराबादी का शेर

नोट: इस संकलन में प्रकाशित सभी कविताएँ संबंधित कवियों की व्यक्तिगत अभिव्यक्ति हैं। ब्लॉग/प्रकाशक इन विचारों से सहमत होना अनिवार्य नहीं मानता और इन विचारों की किसी भी ज़िम्मेदारी से स्वयं को मुक्त करता है।

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