‘नयी कलम’ हमारी वह विशेष शृंखला है, जिसके माध्यम से हम समकालीन साहित्य जगत की नई और सशक्त आवाज़ों को आपके सामने लाते हैं। हमें गर्व है कि यह मंच न केवल स्थापित, बल्कि उन प्रतिभाओं को भी स्थान देता है जो अपने मुख्य कार्यक्षेत्र से इतर साहित्य के प्रति गहरा अनुराग रखती हैं।
आज, ‘नयी कलम‘ में हम एक ऐसे ही रचनाकार को प्रस्तुत करते हुए अत्यंत हर्ष महसूस कर रहे हैं, जिनका परिचय एक ओर जहाँ विज्ञान और तर्क से जुड़ा है, वहीं उनकी आत्मा शब्दों और भावनाओं के मर्म को छूती हैं।
हम बात कर रहे हैं डॉ. देवेंद्र कुमार जी की, जो गणित के कठिन समीकरणों को साधने के साथ-साथ जीवन के जटिल अनुभवों को सरल और हृदयस्पर्शी कविताओं में ढालते हैं। आईये, आज हम उनकी तीन चुनिंदा रचनाओं – ‘तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा’, ‘याद रखना यह वचन’, और ‘समंदर किनारे’ के साथ उनकी इस अद्भुत यात्रा के साक्षी बनें।
परिचय – डॉ. देवेंद्र कुमार
डॉ. देवेंद्र कुमार हरियाणा के एक सरकारी महाविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर, गणित के पद पर कार्यरत हैं।
यह अपने आप में एक विलक्षण संयोग है कि गणित के प्रोफ़ेसर का शब्दों का जोड़ इतना बेहतरीन है। अंकों की दुनिया से निकलकर, वह अपनी कविताओं में सरल शब्दों का उपयोग करते हुए जीवन की सबसे गहरी और जटिल भावनाओं को बड़ी आसानी से व्यक्त कर जाते हैं।
उनकी भाषा में एक ऐसी सहजता और प्रवाह है, जो पाठक को तुरंत कविताओं के मर्म से जोड़ देती है। उनकी रचनाएं बताती हैं कि तर्क और भावनाएं, विज्ञान और कला, दोनों साथ-साथ चल सकते हैं और मिलकर एक सशक्त अभिव्यक्ति को जन्म दे सकते हैं।
डॉ. देवेंद्र कुमार की कवितायें एवं व्याख्या
यहाँ प्रस्तुत हैं डॉ. देवेंद्र कुमार जी की तीन मन को छू लेने वाली रचनाएं:
1. तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा
कौन उसके कूचे में गया होगा तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा
धैर्य उसने किस लिए फिर खोया होगा तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा
यूं तो रोज ही पीता था वो जहर शराब का पर आज वो जी नहीं पाया
कौनसा जहर आज पिया होगा तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा
कोई राहों में उसकी खड़ा होगा कोई तो दर्द उसे देता होगा
तकलीफों में कौनसी घिरा होगा तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा
वो कमजोर नहीं था इतना जितना एहसास करा दिया उसने
कौनसी ताकत से आज लड़ा होगा तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा
जर, जोरू और जमीन सब था उसकी खेलती कूदती जिंदगी में सिवाय गम
मौत ही को उसने क्यों चुना होगा तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा
व्याख्या:
यह कविता किसी अपने के अचानक चले जाने या स्वयं को समाप्त कर लेने के बाद उपजे गहन शोक और अविश्वास को दर्शाती है।
कवि, एक काल्पनिक ‘राजदार’ (भेद जानने वाले) से बार-बार यह प्रश्न कर रहा है कि आखिर उस व्यक्ति ने इतना बड़ा कदम क्यों उठाया। व्यक्ति के पास सब कुछ था, वह कमज़ोर नहीं था, फिर भी उसने मौत को चुना। हर पंक्ति में “तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा” की आवृत्ति, उस अनसुलझे रहस्य और दर्द को उजागर करती है, जो किसी प्रियजन के जाने के बाद उसके करीबियों को आजीवन कचोटता रहता है।
2. याद रखना यह वचन
जब चले ठंडी पवन जल उठे मेरा बदन
मुस्कुराए मन मेरा पर मेरा घबराये तन
ना कोई तूफान है, ना कोई बरसात है
ना कोई है शोरगुल, क्यों नहीं फिर शांत मन
देखकर तुमको अमन याद आए बीते दिन
हम किसी को यूं नहीं बोलते थे दुर्वचन
तोड़ देती है मुझे ये तुम्हारी बेरुखी
मत करो तुम जुल्म इतना कि सह ना पाए तन
देख लेते तुम अगर अपने अन्दर झांक कर
इस तरह ना बात करते तुम्हारे लब अमन
जो लगे सबको बुरा मत कहो ऐसा कथन
बाद में पछताना क्यूं याद रखना यह वचन
व्याख्या:
यह कविता संबंधों में आई कड़वाहट और संचार की कमी पर केंद्रित है। कवि अपनी बेचैनी व्यक्त करता है, जहाँ सब कुछ शांत है, मगर मन अशांत है।
कविता कटु वचनों और बेरुखी के कारण रिश्ते में हो रहे नुकसान को दर्शाती है। यह एक मार्मिक आग्रह है कि शब्दों का उपयोग सोच-समझकर करना चाहिए, क्योंकि बेरुखी और कठोर वचन तन से भी ज़्यादा मन को तोड़ देते हैं। अंतिम पंक्तियाँ एक शाश्वत सीख देती हैं: “जो लगे सबको बुरा मत कहो ऐसा कथन”, यानी बोलने से पहले विचार करना आवश्यक है ताकि बाद में पछताना न पड़े।
3. समंदर किनारे
समंदर किनारे मिलेंगे नजारे
यही सोच कर मैं गया था प्यारे
मगर कुछ नहीं था वहां पर कसम से
सिवा रेत प्यारे समन्दर किनारे
बुझे थे चमन भी वहां तो प्यारे
हवा भी अजब थी समंदर किनारे
कोई दुख न बांटें कोई सुख न बांटें
खड़ी थी दीवारें पड़ी थी दरारें
थे बेशक वो रहते समन्दर किनारे
मगर प्यास थी उन सभी में प्यारे
व्याख्या:
यह कविता अपेक्षा और वास्तविकता के अंतर को अत्यंत सुंदरता से व्यक्त करती है।
‘समंदर किनारे’ जाना एक ‘नज़ारे’ (आकर्षण, सुंदरता) की उम्मीद थी, पर कवि को वहाँ सिर्फ़ रेत और उदासी मिली। यह कविता आधुनिक जीवन की विडंबना को दर्शाती है—लोग भौतिक रूप से ‘समंदर किनारे’ यानी संपन्न या आकर्षक जगह पर हो सकते हैं, पर उनके भीतर अकेलापन, संवेदनहीनता, और भावनात्मक ‘प्यास’ बाकी रहती है। “खड़ी थी दीवारें पड़ी थी दरारें” यह दर्शाता है कि भौतिक निकटता के बावजूद लोग एक-दूसरे से भावनात्मक रूप से कटे हुए हैं।
डॉ. देवेंद्र कुमार जी, हम प्रत्तिज्ञान परिवार की ओर से आपकी इन उत्कृष्ट रचनाओं को साझा करने के लिए आपका हृदय से धन्यवाद करते हैं। आपके शब्द समाज को एक नया दृष्टिकोण देते हैं और हमें विश्वास है कि हमारे पाठकों को आपकी कवितायें बहुत पसंद आएंगी।
आप डॉ. देवेंद्र कुमार जी से ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं।
आपकी कलम को भी मिलेगा मंच!
यदि आप भी डॉ. देवेंद्र कुमार जी की तरह एक रचनाकार हैं, और कवितायें, लेख, या कहानियां लिखते हैं, तो ‘नयी कलम’ शृंखला आपके लिए ही है।
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