हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ का यह दूसरा अंक, आपके विश्वास का प्रतीक और रचनात्मकता का एक नया कदम है। हम लाए हैं कुछ सनसनीखेज, रोचक कहानियाँ और जीवन की जटिलताओं को सरलता से पेश करतीं कवितायेँ।
इस अंक में:
- कहानियाँ: ‘गोश्त’, ‘अग्निपरीक्षा (सलाखें)’ और ‘किराय का कमरा’ सहित कुल सात कहानियाँ— जो रिश्तों की उलझनें और मानव जीवन के संघर्षों को सामने लाती हैं।
- कवितायेँ: ‘बोझ निगल गया’, ‘जाड़ा’ और ‘प्रेम – एक विवादित सत्य’ जैसी सात कवितायेँ आधुनिक संवेदनाओं और आत्म-चिन्तन की गहराइयों को छूती हैं।
- समीक्षा: हिंदी साहित्य के प्रतिष्ठित उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ की एक गहन और सारगर्भित समीक्षा।
- विशेष पेशकश: आध्यात्मिक ज्ञान के जिज्ञासुओं के लिए ‘वेद सार शिवस्तव स्तोत्र’ का सरल हिंदी अनुवाद।
- शायरी संग्रह: ‘अजीब शहर’ के अंतर्गत बेहतरीन शायरी का संग्रह।
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दूसरा अंक – झलकियाँ

इस अंक में आपको मिलेगा वो सब कुछ, जो एक लेखक के मन में द्वन्द्व पैदा करता है— ‘अधेड़ मन’ का डर और ‘बाल मन’ का साहस। हमने समेटी हैं ‘गोश्त’, ‘अग्निपरीक्षा’ और ‘किराय का कमरा’ जैसी 7 रोचक कहानियाँ जो आपको सोचने पर मजबूर करेंगी।
इसके साथ ही, जीवन की जटिलताओं को सरलता से पेश करतीं 7 कविताएँ, और प्रसिद्ध उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ की गहन समीक्षा भी पढ़ें।
विशेष पेशकश: आध्यात्मिक शांति के लिए, ‘वेद सार शिवस्तव स्तोत्र’ का हिंदी अनुवाद इस अंक में विशेष रूप से शामिल है।
संपादकीय
मेरे अधेड़ मन ने मुझसे यह सवाल किया। यह कैसा निरर्थक प्रयास कर रहे हो तुम? और क्यों? उधार ली गई ईटों से कैसी इमारत बना लोगे? तुम्हें वाकई लगता है अपनी धुन में मग्न और व्यस्त कोई मुसाफिर एक पल भी ठहरेगा यहाँ? तुम सोचते हो कोई पर्यटक अपने कैमरे और ज़हन में इस अधूरी इमारत की तस्वीर कैद करेगा? इतनी हवेलियों, मीनारों, ताजमहलों के आकर्षण को छोड़? तुम उपहास के पात्र बनोगे? अपमानित किये जाओगे। यह इमारत ढह जाएगी। इसकी ईंटों के तले दब जाओगे। तुम्हें एक उदाहरण बना दिया जाएगा। और तब शायद ठहर जाए कोई एक पल के लिए।
गोश्त – कावेरी झा (कहानी)
नशे में लड़खड़ाता, जिसकी आँखों में लालच और बल की क्रूर चमक थी, वह कमरे में दाखिल हुआ था और किवाड़ यूँ ही खुला छोड़ टूट पड़ा था। रमेश को गोश्त की दावत बहुत पसंद थी। ब्याह के जलसे में दोस्तों के साथ जम कर गोश्त-भात खाया था। और अब बिस्तर पर भी। मालती का शरीर उसके लिए एक बेजान, मांस का टुकड़ा था, जिसे वह अपनी मर्ज़ी से खा सकता था। यह गोश्त और यह दावत अब रोज़ होगी।
बोझ निगल गया – नितेश मोहन वर्मा (कविता)
पिछले साल का सूखा
बहा ले गई इस साल बारिश
दिल का बोझ दो मन और बढ़ गया
अगर सूखा पड़ता
तो इस बोझ में कितना इजाफा होता?
यह आसमान का बाँध
किस पार्टी की सरकार ने बनवाया था?
कैसे टूट गया?
क्यूं होता है – राहुल गौड़ (कविता)
क्यूं होता है कभी-कभी
कि ताबूतों के जंगल सी दिखती है भीड़
हर चेहरा एक बंद खिड़की
और शोर एक नीरव सन्नाटे में बदल जाता है,
जाने-पहचाने रास्ते उलझ जाते हैं एक भूलभुलैया में
और अदृश्य सलाखों में बन्द मन छटपटाता है।
वेद सार शिवस्तव स्तोत्र का हिंदी अनुवाद – शिव कुमार शर्मा
पशुओं के स्वामी, हे पाप विनाशी,
गजेन्द्र के धारक, परम पुण्य ज्ञानी।
जटाएँ हैं जिनकी, नित्य गंगा बहाएँ,
कामदेव के हंता, परम शिव को ध्याएँ।
अर्थ – जो सम्पूर्ण प्राणियों के रक्षक हैं, पाप का ध्वंस करने वाले हैं, परमेश्वर हैं, गजराज का चर्म पहने हुए हैं तथा श्रेष्ठ हैं और जिनके जटाजूट में श्रीगंगाजी खेल रही हैं, उन एकमात्र कामारि श्री महादेवजी का मैं स्मरण करता हुॅं।
जीवन की चुनौती – पिंकी गिरी (कहानी)
अपने फ्लैट की बालकनी से देखता हुआ दिनेश उस साँझ के अँधियारे में खोता जा रहा था।
जैसे-जैसे अँधेरा बढ़ रहा था, दिनेश को ऐसा लगा कि उसके जीवन में भी कोई अँधेरे की काली छाया फैलती जा रही है। वह मन ही मन सोचने लगा “कैसा ये जीवन है, कैसी ये कश्मकश है?” बस अभी वह टूटा नहीं था। टूटने की कगार पर था। इंतज़ार था की कोई काँधे पर अपना हाथ रख दे। फिर वो ख़ुद को रोक ना पाता।
किराए का कमरा – नमो नारायण दीक्षित (कहानी)
शादी को मुश्किल से दो महीने हुए थे। रिशु और मुस्कान महानगर की भीड़-भाड़, शोर और एकाकीपन से जूझते हुए एक संकरी सी गली में एक किराये के कमरे में आ बसे थे। कमरा था, मगर उसमें घर जैसी कोई बात नहीं थी—दीवारें नंगी, छत से टपकती सीलन और खिड़कियों पर पड़ी धूल मानो कह रही थी की यहाँ भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं। बिस्तर नहीं था, इसलिए अखबार बिछा कर नींद ओढी जाती।
खोली नंबर २६ – आसिफ अंसारी (कहानी)
उसके अब्बू के डर, समाज की बंदिशों की ज़ंजीरें अब उसके पैरों को नहीं बाँधती थीं। आसिफ की गैर-मौजूदगी ही उसकी आज़ादी थी। वो अपनी पसंदीदा धुन लगाती। कभी कत्थक की नज़ाकत, कभी फ़िल्मी गानों का जोश, कभी लोक-नृत्य का चंचल अंदाज़। उसकी हर अदा में एक तड़प थी, एक भूखी हसरत जो अब पंख फैलाकर उड़ना चाहती थी।