गुनाहों का देवता उपन्यास की गहन समीक्षा। धर्मवीर भारती जी की इस कालजयी प्रेम कहानी में प्रेम, वासना और सामाजिक संबंधों की जटिलताओं को समझें। चंदर और सुधा के पात्रों के माध्यम से एक अनोखी प्रेम गाथा का अनुभव करें।


प्रेम में समर्पण, प्रेम और समर्पण, बिना प्रेम के समर्पण, प्रेम में वासना की महत्ता, पुरुष और स्त्री के दायित्व, उनके कर्तव्य और उनसे अपेक्षाएं, सामाजिक और राजनितिक व्यवस्था, समाज, परिवार और राजनीति में स्त्री की भागीदारी – ऐसे अनेक पहलुओं को बहुत बारीकी और जटिल सरलता हे परखा है धर्मवीर भारती जी ने हिंदी साहित्य के कालजयी उपन्यास “गुनाहों का देवता” में।

धर्मवीर जी लिखते हैं:

HIndi Quote from Gunahon ka Devta Book by Dharamvir Bharti.

इन पेचीदा सवालों में घिरा हुआ है ‘गुनाहों का देवता’ का मुख्य किरदार – चन्द्रकुमार कपूर। एक चक्रव्यूह है जिसे भेदना उसे नहीं आता। उसे आता है और उलझ जाना। क्या वो देवता है? और क्या हैं गुनाह इस देवता के? 


गुनाहों का देवता – मेरे विचार 

मेरा गुनाह की मैंने अपने जीवन में इतनी देर से हिंदी साहित्य की इस महत्वपूर्ण और चर्चित रचना को पढ़ा। ये गुनाहों का देवता का तिरासीवाँ संस्करण है। इस पुस्तक और मेरा, दोनों का इंतज़ार लंबा रहा।

सर्वप्रथम मैं आभारी हूँ अपने कवि मित्र अतुल दुबे जी का जिनके कहने पर मैने ये उपन्यास पढ़ना शुरू किया।

और ये भी बता दूँ कि पढ़ने से पहले मुझे इस उपन्यास की कहानी और किरदारों के बारे में थोड़ी सी भी जानकारी नहीं थी। इसलिए मैने जब ये उपन्यास खरीदा तो मैं समझ रहा था इसमें लूटपाट, कत्ल या राजनीति से जुड़े हालात होंगे। 

समाज में गुनाह के प्रभाव, और कैसे किरदारों के जीवन में उथल पथल मचेगी, मैं ये पढ़ने और जानने का इच्छुक था। किंतु ऐसा कुछ नहीं था। ये एक प्रेम कहानी है। फिर गुनाह कैसा? और उस पर से गुनाहों का देवता? ये कैसी पहेली रच डाली धर्मवीर जी ने? 

महज़ पहेली नहीं। ये पूरा का पूरा चक्रव्यूह निकला।

एक और ख्याल ये आया कि अगर ये किरदार और ये कहानी इक्कीसवीं सदी के प्रयागराज में होते, तो क्या अलग होता। शायद सब कुछ। 

प्रेम की परिभाषा बदल चुकी है। उसकी छाप अवश्य होती कहानी और किरदारों में। समाज और परिवार में स्त्री की भूमिका भी बदली है। हाँलाकि सफर अभी लम्बा है। राजनीति भी पूर्णतः बदल चुकी है। 

एक पिता अपनी पुत्री के प्रति अपने दायित्व का निर्वाह क्या ठीक वैसे ही करता जैसे डॉक्टर शुक्ला ने किया?

प्रेम में जिस विरोधाभास से कहानी के मुख्य किरदार गुज़रे हैं, क्या उनकी प्रतिक्रिया बिलकुल भिन्न नहीं होती?

क्या प्रेम में इस समर्पण को कायरता कहा जाता? 

मैं चाहता हूँ सब लिख डालूँ किन्तु मैं नहीं चाहूँगा की नए पाठकों के मन में किसी प्रकार का पूर्वाभास जन्म ले। मैंने सादे स्लेट से इसे पढ़ा और अपने विचार बनाये। मैं चाहता हूँ आप भी वैसा ही करें। फिर इस पर किसी दिन चर्चा करेंगे।  

इसलिए पहले पूजनीय धर्मवीर जी से एक शिकायत।

उपन्यास के तीसरे पृष्ठ में धर्मवीर जी ने कवियों की खूब फजीहत की है। उनके शब्दों में “कविजन प्रेमियों और दार्शनिकों से निकृष्ट कोटि के जीव हैं।” एक कवि होने के नाते कुछ असहनीय अवश्य लगा। फिर उन्होंने ये सत्य कहा की “कविता संग्रह कहानी संग्रह या उपन्यास की तुलना में कम बिकते हैं।”  खैर अब शिकायत जाने देते हैं। 

बात आगे बढ़ाते हैं “गुनाहों का देवता” और उसके किरदारों की। 


गुनाहों का देवता – मुख्य किरदार 

इस उपन्यास के दो सबसे मुख्य किरदार हैं एक देवता और एक उसकी पुजारन – चन्दर और सुधा। पम्मी और बिनती भी दो ख़ास किरदार हैं जो इस चक्रव्यूह को अभेद बनाते हैं। 

गेसू, डॉ. शुक्ला, बिसरिया, कैलाश, बुआ जी, बर्टी जैसे कुछ और महत्वपूर्ण किरदार हैं जो इस कहानी को दिशा प्रदान करते हैं और देवता को भ्रमित। 

सुधा, गुनाहों के देवता की पुजारन, एक अपवाद है। उसके सिवा हर किरदार का एक अपना सफर रहा है। उनकी सोच, उनका व्यक्तित्व, आचरण, सिद्धांत – शुरू से अंत तक कुछ बदले हैं। ख़ास तौर पर चन्दर। इनका सफर जलेबी जैसा रहा है।  देवता क्यों स्थिर न रह सका? क्यों डोलता रहा उसका मन और उसके आदर्श? 

ये सवाल इसलिए क्योंकि धर्मवीर जी ने ये असमंजस कायम रखा। ये उनकी लेखनी की ताकत है और यकीनन महारत। 

ऐसे कई दृश्य रचे हैं शब्दों से जहाँ स्त्रियों के सामाजिक और परिवारिक भूमिका पर सवाल उठाये गए हैं। क्यों उनकी किस्मत और भविष्य का निश्चय पुरुष कर रहे हैं। लेकिन ये तो समाज का सत्य है।  लेखक ने सच को अक्षरों से बुना है। किन्तु यदि बारीकी से देखा जाये, तो इन स्त्री किरदारों ने इस कथा को आगे बढ़ाया है, दिशा दी है, ऊपर – नीचे और गोल – गोल घुमा कर रख दिया है। फिर वो सुधा हो, बिनती हो, पम्मी हो या गेसू। 

लेकिन क्या ये भी समाज और रिश्तों का एक सच नहीं है? इसका जवाब आप सोचिये और मन करे तो हमें बताइये। 

और अगर आप अभी तक ये महत्वपूर्ण और चर्चित उपन्यास पढ़ने से वंचित रहे हैं, तो और देर न कीजिये। आप वाणी प्रकाशन के वेबसाइट से ये उपन्यास खरीद सकते हैं। 


धर्मवीर भारती – एक संक्षिप्त परिचय 

धर्मवीर भारती (२५ दिसंबर १९२६ – ४ सितंबर १९९७) आधुनिक हिंदी साहित्य के एक प्रमुख कवि, लेखक, नाटककार और पत्रकार थे। उनका जन्म इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ और उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा भी वहीं से प्राप्त की।

धर्मवीर जी ने अपने लेखन की शुरुआत कॉलेज के दिनों से ही कर दी थी। उनका पहला और सबसे लोकप्रिय उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ (१९४९) हिंदी साहित्य में एक मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने उन्हें अद्वितीय लोकप्रियता दिलाई।

एक लेखक के तौर पर उनकी प्रतिष्ठा एक कवि के साथ-साथ एक अप्रतिम गद्य लेखक की भी रही है। उनकी प्रमुख कृतियों में उपन्यास ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ (१९५२) और गीति-नाट्य ‘अँधा युग’ (१९५४) शामिल हैं। इसके अलावा, उनके कहानी-संग्रह जैसे ‘मुर्दों का गाँव’ और निबंध-संग्रह जैसे ‘ठेले पर हिमालय’ भी बेहद प्रसिद्ध हैं।

लेखन के साथ-साथ, उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। वे साप्ताहिक पत्रिका ‘धर्मयुग’ के प्रधान संपादक रहे, जिसे उन्होंने अपनी संपादकीय क्षमता से उस समय की एक अत्यंत लोकप्रिय और प्रभावशाली पत्रिका बना दिया।

अपनी रचनात्मकता और साहित्य में योगदान के लिए धर्मवीर भारती को वर्ष १९७२ में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त, उन्हें साहित्य अकादमी और व्यास सम्मान जैसे कई अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी नवाजा गया।


क्या चन्दर और सुधा की ये कहानी धर्मवीर जी के जीवन से प्रेरित है?

बहुत से लोगों का मानना है कि धर्मवीर भारती जी का उपन्यास ‘गुनाहों का देवता‘ उनके जीवन की घटनाओं से प्रेरित है। 

  • सुधा और कांता वर्मा: उपन्यास में सुधा का किरदार, धर्मवीर भारती जी के गुरु धीरेंद्र वर्मा की बेटी कांता वर्मा से प्रेरित है, जिनसे वे असल जीवन में प्यार करते थे ।
  • वैवाहिक संबंध: वास्तविक जीवन में, धर्मवीर भारती ने कांता वर्मा से शादी की, लेकिन बाद में उन्हें अपनी शिष्या पुष्पा शर्मा के लिए छोड़ दिया। कांता भारती ने ‘रेत की मछली‘ नामक अपनी किताब में इस घटना का वर्णन किया ।

हालांकि उपन्यास में चंदर और सुधा की शादी नहीं होती, यह माना जाता है कि कहानी के कुछ पहलू उनके जीवन से जुड़े हुए हैं। 

अगर आपने कांता जी की किताब ‘रेत की मछली’ पढ़ी है तो अपने विचार हमसे साझा करें। मैं भी ये किताब पढ़ कर उसकी समीक्षा प्रस्तुत करूँगा। हमसे जुड़ने की लिए धन्यवाद।


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