देश, भाषा और समाज – इन सभी की ज़रुरत है की युवा कलम और आवाज़ उठायें। जो वर्षों पहले सोचा गया, लिखा गया – उसे पढ़ना आवश्यक है। परन्तु उतना ही ज़रूरी है हमारे आज की तस्वीर उकेरना, कोरा सच परोसना और आने वाले कल पर सवाल उठाना।  

इस दिशा में हमारी हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ एक प्रयास है हिंदी साहित्य की नयी आवाज़ों को पाठकों तक ले जाने का। हिंदी साहित्य की नयी प्रतिभाओं को सम्मान और पहचान दिलाने की ये हमारी मुहीम है।

अपने इस ब्लॉग परमैं पिछले ५ वर्षों से ज़्यादा से कहानियाँ, कवितायें लिखता रहा हूँ और साथ ही दूसरे लिखने वालों को भी पढ़ता रहा हूँ।

इन लिखने वालों की किताबें आपको दुकानों पर नहीं मिलेंगी पर यह सभी बेहतरीन लिखते हैं। आज के मसलों पर लिखते हैं और मैं मानता हूँ कि मेरे साथ-साथ इनकी लेखनी को पढ़ना भी हिंदी साहित्य के पाठकों के लिए उतना ही ज़रूरी है और उतना ही रोचक भी है।

पर इनकी यह आवाज, इनकी कहानियाँ, नज़्में, लेख, इनके शब्द पाठकों तक कैसे पहुँचे?

यह सवाल मुझे बहुत समय से परेशान कर रहा था। कचोट रहा था। कितने अच्छे लिखने वाले हैं। इनकी सोच को भी लोगों तक पहुँचना चाहिए और सोशल मीडिया के २०, ३० या ४०  सेकंड नहीं, पर इत्मीनान से पहुँचना चाहिए जहाँ लोग आराम से, अपने घर में बैठकर इनकी रचनाओं को पढ़ सकें। इत्मीनान से पढ़ सकें और एक वार्तालाप कर सकें। 


इसी सोच के साथ जन्म लिया ‘प्रतिज्ञान’ ने। 

मुझे आपको यह बताते हुए बहुत खुशी और गर्व हो रहा है की प्रतिज्ञान का पहला अंक तैयार है। आप इसे अमेज़न पर अभी खरीद सकते हैं, पढ़ सकते हैं। इस अंक में मैंने देश के अलग-अलग हिस्सों से चुनिंदा रचनाकारों की कहानियाँ, कवितायें, रेखाचित्र और शायरी को प्रस्तुत किया है। यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा। 

मैं चाहता हूँ कि अगर आप लिखते हैं – कहानी लिखते हैं, कवितायें लिखते हैं, नज़्म या शायरी लिखते हैं तो हमसे ज़रूर संपर्क करें। अपनी रचना हमें भेजें । हमारा प्रयास रहेगा की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं को, नयी आवाजों को, उभरते लेखकों को हम प्रतिज्ञान के पाठकों तक पहुँचायें।

यह मासिक हिंदी पत्रिका है। हर महीने इसका अंक आएगा जिसे लोग ऑनलाइन खरीद सकते हैं। ईबुक के प्रारूप में इसे खरीद कर लोग पढ़ सकते हैं। यह माध्यम बनेगा हिंदी साहित्य के नए रचनाकारों को पाठकों से जोड़ने का। 

हमारी यही विनती है कि आप इस सफर में हमारे साथ जुड़ें। एक लेखक के तौर पर, एक पाठक के तौर पर। अपनी रचनायें हमसे साझा कीजिये, अपने सुझाव हम तक भेजिए। अपनी शिकायतें हम तक भेजें। हम आपकी बात सुन रहे हैं और हम उन पर अमल भी ज़रूर करेंगे। 

प्रतिज्ञान का यह सफर मैंने अकेले शुरू नहीं किया है। साथी रचनाकारों को पढ़कर इस ख्याल ने जन्म लिया है। आप सभी का आभार। पढ़ने वालों को धन्यवाद। जिन रचनाकारों ने प्रतिज्ञान के पहले अंक में अपनी रचनायें भेजी हैं, हम पर भरोसा किया है – उनका तहे दिल से शुक्रिया करता हूँ। प्रणाम।

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