वह टूटा नहीं था। टूटने की कगार पर था। बस इंतज़ार था की कोई काँधे पर अपना हाथ रख दे। फिर वो खुद को रोक न पाता।

ये था हमारा पहला हिंदी कहानी प्रॉम्प्ट। इस महीने की पहली तारीख को हमने अपने इंस्टाग्राम पेज पर ये पंक्तियाँ साझा की थी। अनुरोध ये था की इन पंक्तियों का उपयोग कर ४०० या अधिक शब्दों में एक कहानी लिखिए। इन पंक्तियों से कहानी शुरू की जा सकती थी या फिर इन्हें कहानी के मध्य या अंत में सम्मिलित किया जा सकता था। 

साथ ही जो लिखने वाले इसे कविता का रूप देना चाहते थे, हमने उनसे अनुरोध किया की कविता के रूप में एक कहानी लिखें। 

पिछले महीने हमने हमारा पहला कविता प्रॉम्प्ट जारी किया था। उसकी सफलता से हमारा मनोबल बढ़ा और अब पेश है हमारा पहला हिंदी कहानी प्रॉम्प्ट। 

तो चलें, बिना और देर किये, सभी प्रतिभागियों की रचनायें को पढ़ें और अपने सुझाव हमें अवश्य भेजें। 


हिंदी कहानी प्रॉम्प्ट के रचनाकार 


एक गाँव, एक सपना, एक काँधा – अनीता कवात्रा 

रघुवीर गाँव का सीधा-सादा किसान था। सुबह सूरज निकलने से पहले बैल जोत लेता, दिन भर खेतों में पसीना बहाता और रात को टूटी चारपाई पर थका-हारा सो जाता। जीवन भर की कमाई भी बस घर का चूल्हा जलाने लायक थी।

पर एक सपना उसके सीने में पलता था – “मेरी बिटया पढ़-लिख कर बड़ा ईंसान बने।”

गाँव वाले हँसते – “ए रघुवीर, किसान की बेटी अफ़सर बनेगी? ये तो कहावत है।”

मगर रघुवीर ने ठान लिया।  खेत बेचकर, उधार लेकर, उसने बेटी सीमा को शहर पढ़ने भेजा। खुद फटे कुर्ते में गुज़ारा करता, पर उसकी किताबों पर कभी धूल न जमने देता।

वक़्त गुज़रा।

सीमा दिन-रात मेहनत करती रही और एक दिन ख़बर आई – “बेटी अफ़सर बन गई है।”

गाँव मं हलचल मच गई, लोग वही पर जुबान अब बदल चुकी थी  – “वाह रघुवीर, तूने तो कमाल कर दिया!”

पर रघुवीर भीतर से सूख चुका था। बरसों की मेहनत, अकेलापन और समाज की ठोकरें उसे तोड़ चुकी थीं। उसका शरीर खेतों की मिटटी सा कठोर था, मगर दिल दरारों से भरा हुआ।

वो टूटा नहीं था, टूटने की कगार पर था।

बस इंतज़ार था की कोई काँधे पर हाथ रख दे, और फिर वह ख़ुद को रोक न पाए।

उस दिन सीमा अधिकारी की वर्दी पहनकर गाँव लौटी। जैसे ही चौखट पर पहुँची, रघुवीर उसे देखता ही रह गया। आँसू आँखों में उमड़ आए, पर वह रोया नहीं।

सीमा ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर उसके काँधे पर हाथ रखा और धीमे से कहा – “बाबूजी, अब आपको दुनिया की ठोकरें अकेले नहीं सहनी पड़ेंगी। आपकी बिटिया लौट आई है।”

बस इतना सुनते ही रघुवीर का बाँध टूट गया। बरसों से दबे आँसू धार बनकर गालों पर बह निकले। वह फूट-फूटकर रो पड़ा, जैसे कोई बच्चा हो।

आँगन में लोग खड़े थे, पर उस पल रघुवीर को परवाह न थी। बरसों बाद उसे सहारा मिला था – अपनी ही संतान का।

गाँव की नज़रों में रघुवीर किसान ही था, पर उस दिन उसकी नज़रों में वह दुनिया का सबसे धनी पिता था।

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स्वस्थ जीवन की राह – प्रतिभा सिंह 

कुछ दिन पहले, अपने हालिया स्कैन के नतीजों पर चर्चा के लिए एक ऑन्कोलॉजी अपॉइंटमेंट में, उसे बताया गया कि उसके शरीर के कई हिस्सों में कैंसर बढ़ रहा है। पिछले तीन सालों में उसे काफी बार ऐसी ही दुखद खबर मिली है, लेकिन चूँकि उसके इलाज के विकल्प कम होते जा रहे हैं, इसलिए यह दिन ज़्यादातर दिनों से ज़्यादा भारी था।

यह कहानी है मिहिर की जो की एक खतरनाक बीमारी जिसका नाम कैंसर (कर्करोग) है उससे दिन प्रतिदिन जूझ रहा था।  हर बार की तरह डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ली और डॉक्टर का वही नकारात्मक जवाब उसे अंदर ही अंदर तोड़ता जा रहा था। अपॉइंटमेंट खत्म होने पर उसने सोचा, “बस, अब और नहीं” 

वो टूटा नहीं था। टूटने की कगार पर था। बस इंतजार था की कोई काँधे पर अपने हाथ रख दें। फिर वो खुद को रोक नहीं पाता। यह वही दिन है जब उसकी हिम्मत जवाब दे रही थी। यही वो पल है जब उसको टूटने से रोका जा सकता है। इस दर्द को वो कविता में बयाँ नहीं कर सकता। यही सोचते–सोचते वो कब सो गया और इतनी देर तक सोता रहा कि रात हो गई। अब आखिरकार अपनी आँखें खोलने की हिम्मत जुटा पाता है। 

भगवान का शुक्र है, कि वो हारा नहीं । फिर से नई ऊर्जा के साथ उठ खड़ा हुआ अपनी बीमारी को हराने के लिए। आज सुबह, पार्क में, उसकी जीवन साथी ने उसे सबसे पुराने गाने पर नाचते हुए देखा। अपने साथी की खिलखिलाहट देखकर उसे लगा “अब मुझे जीना है” 

उसे पता है कि ज़िंदगी का मतलब अपनी ज़िंदगी से प्यार करना है, चाहे वह किसी भी रूप में सामने आए। अपने लिए नहीं पर अपने परिवार के लिए ही सही। 

पिछले कुछ सालों में यह पहली बार नहीं था कि उसे  चिंता हुई थी उसकी स्वास्थ्य संबंधी खबरों से  लेकिन यह पहली बार था जब उसका मनोबल बरकरार रहा। 

जब उस  दिन  उसके डॉक्टर स्कैन के नतीजे देख रहे थे,  उसके हाथ काँप रहे थे, इतना घबराया हुआ था कि सच जानने से भी डर रहा था। वो असहनीय रूप से कमज़ोर, नाज़ुक महसूस कर रहा था, मानो उसके दिल को यकीन हो रहा था कि वो भावनात्मक रूप से टूटने की कगार पर था। 

कुछ ही देर बाद उसने सोचा कि अगर मेरा हौसला टूटा, तो किसी और का भी टूट सकता है। शायद मेरे जीवन साथी का, शायद मेरी माँ का। कभी-कभी उसे ऐसा लगता जैसे वह किसी तूफ़ान में खड़ा है और अपनी खोपड़ी पर उड़ते मलबे से खुद को बचाने के लिए एक भी उंगली नहीं उठा पाने में असमर्थ है। कई सवाल उसे परेशान कर देते कि मुझे कुछ हो गया तो मेरे अपनों का क्या होगा, पिताजी का कुछ सालों पहले ही स्वर्गवास हो चुका था। घर में अकेला कमाने वाला था। उसके बिना उसका परिवार बिखर जाएगा। यह सब चिंताएं उसे और कमजोर बना रही थी। उसे यह एहसास था कि अब उसकी रेखाएं दूसरे की रेखाओं से जुड़ी हुई हैं जो उसे हारने नहीं देती है। 

एक दिन उसके दोस्त ने कहा – “इस समय तेरी मुख्य आध्यात्मिक साधना यह है कि तू योग कर ,प्रभु का नाम ले और व्यर्थ का चिंतन करना छोड़ दे। अपना ख्याल रख और अपने चेहरे की मुस्कुराहट बरकरार रख। यह मृत्यु लोक है। एक ना एक दिन सबको इस दुनिया को अलविदा कहना है।” 

वह थोड़ा रुका और फिर बोला – “मिहिर मेरे दोस्त, अभी तेरा समय नहीं आया है।” 

जैसे उस दिन उसके दोस्त के जीभ पर सरस्वती विराजमान थी। तभी फोन की घंटी बजती है, दूसरी तरफ से आवाज आती है – “मिस्टर मिहिर! आपकी इस बार की रिपोर्ट विदेश के डॉक्टर को भेजी गई थी जहाँ से सकारात्मक जवाब आया है। आप  पूरी तरह से ठीक  हो  सकते हैं।”

आखिरकार सूरज ने बादलों को चीर कर रोशनी दे ही दी है।

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गेहूं की तरह – मनीषा जैन

वो जी रहा था जिस तरह
कोई जीता नहीं था उस तरह
कभी पक्षी की तरह आकाश में उड़ने की चाह
कभी कैदी की तरह आज़ाद होने की चाह
वो टूटा नहीं था
वो टूटने की कगार पर था
आज उसका मन तार-तार था
वो उफनते समुद्र की तरह
भरी हुई आंखों में धुंधली रोशनी के साथ
बस इंतजार था
कि कोई काँधे पर अपना हाथ रख दे
कि अचानक सामने से भीड़ के बीच
किसी युवती की इज़्जत को बिखरता देख
उसकी शिराओं में खून का बादल घूम गया
उसकी आँखों में सुधा का चेहरा घूम गया
फिर वह खुद को रोक न पाया
बिना कुछ सोचे समझे
जिस कोलाहल से बचकर वो भागा था
एक महीन से आज़ादी के लिए
फिर भीड़ का हिस्सा हो गया
स्वयं के लिए नहीं
किसी दूसरे के लिए
बस अपना कर्तव्य समझ
समा गया बेकाबू भीड़ की चक्की में
और पिस गया गेंहू की तरह।

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किराए का कमरा – नमो नारायण दीक्षित 

शादी को मुश्किल से दो महीने हुए थे। रिशु और मुस्कान महानगर की भीड़-भाड़, शोर और एकाकीपन से जूझते हुए एक संकरी सी गली में एक किराये के कमरे में आ बसे थे। कमरा था, मगर उसमें घर जैसी कोई बात नहीं थी—दीवारें नंगी, छत से टपकती सीलन और खिड़कियों पर पड़ी धूल मानो कह रही थी की यहाँ भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं।

बिस्तर नहीं था, इसलिए अखबार बिछा कर नींद ओढी जाती। खाना बाहर से आता, जो न पेट भरता था न मन। घर का पहला महीना जैसे जीवन का कठिन गणित बन गया था—एक तरफ सपनों की ऊँचाई, दूसरी तरफ जेब की गहराई। 

खाने की व्यवस्था पहले बाहर से होती, लेकिन जल्द ही जेब ने चीख़ना शुरू कर दिया। फिर एक-एक कर ज़रूरी सामान जुटाया गया—एक पुराना गैस चूल्हा, कुछ बर्तन, एक सेकंड हैंड पंखा। दिन रात राशन की गणनाएं, खर्चों की काट-छांट और घर चलाने की चुनौतियाँ सर उठाने लगीं।

रिशु, एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार का महत्वाकांक्षी युवा, जिसकी आँखों में सरकारी नौकरी का सपना था। और मुस्कान—उसका नाम जितना प्यारा, जीवन उतना ही कठिन। वह हर दिन को आसान बनाने की जद्दोजहद में लगी थी—कभी गिने चुने बर्तनों से नयी रसोई सजाती, कभी किराए के इस मकान में दीवारों पर अखबार चिपका कर उन्हें अपना बनाने की कोशिश करती। 

इन सबके बीच, एक दिन मुस्कान ने घबराकर रिशु से कहा, “इस बार मासिक धर्म समय पर नहीं हुआ…” 

डर, संकोच, और असमंजस के बीच वह डॉक्टर के पास गई। रिपोर्ट आई—हार्मोनल असंतुलन। इसके चलते मुस्कान के बाल असमय सफेद होने लगे। आईने में खुद को देखना उसे अब गवारा नहीं होता था। 

आत्मविश्वास चूर-चूर हो रहा था।

पर अभी वह टूटी नहीं थी, टूटने की कगार पर थी। बस इंतज़ार था की कोई उसके काँधे पे अपना हाथ रख दे, फिर वो खुद को रोक न पाती।

रिशु ने उस दिन मुस्कान को खुद से लगाकर कहा कहा, “तू हारी नहीं है, बस थक गई है। मैं हूँ न तेरे साथ…” और एक नए सवेरे की उम्मीद फिर से जाग उठी। 

इसी मकान की पिछली ओर रहती थीं पूजा भाभी। हंसमुख, मददगार और हमेशा सलीके से बात करने वाली। घर में पानी के मोटर की ज़िम्मेदारी उन्हीं के पास थी। अक्सर जब पानी आता, रिशु उन्हें कॉल करता—“भाभी, मोटर चला देना।” और भाभी जवाब देतीं, “हाँ भैया, चला दी।”

एक दिन मोटर बहुत कम चली। टंकी भरने से पहले ही बंद हो गई। मुस्कान पीने के लिए पानी भी नहीं भर पाई थी। दिन गर्म था, और मूड पहले से चिड़चिड़ा। रिशु ने झुंझलाकर फोन किया, “भाभी, बार-बार बोलना पड़ता है क्या! थोड़ा चलने दिया करो न।”

पूजा कुछ नहीं बोलीं, बस “सॉरी भैया” कह के फ़ोन रख दिया।  

मुस्कान के आधार कार्ड पर जो जन्म तिथि दर्ज थी, वो असल जन्म तिथि से अलग थी। रिशु ने उसी तिथि पर एक सरप्राइज़ प्लान किया। मुस्कान को नहीं पता था। वह दिन और दिनों से अलग बनाना था। रिशु अकेला नहीं कर सकता था, तो उसने मदद ली—पूजा भाभी की। 

भाभी की मदद से मुस्कान को खबर लगे बिना उसने सारी तैयारी कर ली और रात ठीक १२ बजे रिशु कुछ गिफ्ट बॉक्स और एक गुलाब के फूल के साथ मुस्कान के सामने आया, मुस्कान को ज़रा भी अहसास नहीं था की उसे कभी इस तरह का सरप्राइज़ भी मिल सकता है।

मुस्कान की आँखें भर आईं। 

उसने ज़ोर से रिशु को अपनी बाहों में समेट लिया और रो पड़ी। 

“असल जन्मदिन कब है, इससे क्या फर्क पड़ता है,” रिशु ने कहा, “महत्व इस बात का है की तू हर दिन मेरे साथ है।”

मुस्कान रिशु को बस देखती रही। रिशु ने मुस्कान की आँखों के सामने चुटकी बजाते हुए बोला “कहाँ खो गई? अभी केक भी काटना है” कहते हुए दोनों हस पड़े।

फिर अगले दिन केक, नमकीन, बिस्किट और टॉफ़ी को प्लेट पर सजाकर पूजा भाभी के यहां ले जाया गया।  फिर पूजा ने मुस्कान को सारी प्लानिंग बताई की कैसे-कैसे बहाने से रिशु ने तुमसे छिप छिप सारा आयोजन किया। 

चाय की चुस्कियों के साथ कमरे में हंसी गूँज उठी। 

उस दिन पूजा भाभी सिर्फ एक पड़ोसी नहीं रहीं, वो उस छोटे-से परिवार का चुपचाप हिस्सा बन गईं।

उसी मकान के नीचे रहते थे नारायण भइया और उनकी पत्नी लक्ष्मी। वे राजस्थान से आए थे। नारायण फालूदा आइसक्रीम का ठेला चलाते थे और लक्ष्मी, घर में रहकर फालूदा तैयार करने में उनका हाथ बँटाती थी—सिरप बनाना, ड्राय फ्रूट्स काटना, और बेस तैयार करना। 

एक दिन मुस्कान ने लक्ष्मी को देखा – छोटी-सी रसोई में, गर्म चूल्हे के सामने, पसीने में लथपथ, फिर भी चेहरे पे संतोष की एक स्थिर रेखा। 

“इतनी मेहनत में भी कैसे मुस्कुरा लेती हैं?” मुस्कान ने खुद से पूछा।

रिशु ने उन्हें चाय पर बुलाया। वह पहली चाय की प्याली, एक रिश्ते की शुरुआत बन गई। धीरे-धीरे दो परिवारों की बातचीत, साझा दुःख-सुख, त्योहारों की मिठास और रोज़मर्रा की कड़वाहट—सब बंटने लगी। 

गर्मियों की तपिश में कभी-कभी नारायण भैया ठंडा फालूदा ऊपर लाते। ज़िन्दगी कठिन थी, मगर अब अकेली नहीं थी।

कुछ समय बाद गर्मियों की छुट्टी समाप्त हो गई और लक्ष्मी बच्चों को लेकर राजस्थान वापस लौट गई। 

अब वो बच्चों के खेलने का शोर नहीं आता था, न ही लक्ष्मी की आवाज की “भाभी चाय बना ली है आप मत बनाना।”

जहाँ पहले शोर भरा हुआ था वहां अब सन्नाटे के सिवा कुछ नहीं रहा। 

नारायण अकेले रह गए। उनकी हंसी अब अधूरी-सी लगती थी, मानो किसी ने उसका रंग चुरा लिया हो। कुछ दिनों बाद उनका साला लाल आया—युवा, हंसमुख और रिशु का हमउम्र। उनसे बातें करना, हंसी-मज़ाक करना, रिशु को अच्छा लगने लगा।

नारायण फालूदा का काम लाल को सौंप कर कुछ दिनों के लिए गांव चले गए। लाल अक्सर रिशु और मुस्कान को समोसे आदि दिया करता था। एक दिन बातों-बातों में रिशु ने कहा “बहुत समोसा खाते हो”

लाल ने मुस्कुराते हुए कहा – “अब पेट भरने के लिए कुछ तो खाना ही पड़ेगा”

उस दिन रिशु को पता चला की लाल अक्सर ब्रेड समोसे आदि खाकर ही काम चलाता है क्योंकि उसे खाना बनाना नहीं आता है। 

तब उसने मुस्कान से बात की, की जब तक नारायण भइया वापस नहीं आ जाते तब तक क्यों ना लाल के लिए भी खाना बना लिया करो।     

मुस्कान, जो पहले घर की चौखट से बाहर कम ही निकलती थी, अब लाल के लिए दोपहर का खाना बना देती। रिश्ता पारिवारिक था, आत्मीय था, मगर अस्थायी भी।

नारायण के गांव से वापस आ जाने के बाद, एक दिन लाल अचानक बिना बताए ही चला गया। रिशु और मुस्कान को ऐसा बिलकुल भी अंदाजा नहीं था की लाल इस तरह बिना बताए चला जाएगा।

एक शाम नारायण भइया ऊपर आए। हाथ में चाय का कप था। रिशु ने हँसते हुए कहा, “भइया, आप चाय छोड़ने नहीं देंगे क्या?”

नारायण मुस्कुराये नहीं। कुछ क्षण चुप रहे, फिर बोले – “दिवाली में गांव चला जाऊंगा… तब छूट जाएगी।”

उनकी आवाज़ भर्रा गई। कप से उठती भाप में उनकी आँखें धुंधला गईं।

रिशु और मुस्कान स्तब्ध थे। एक साधारण वाक्य में इतनी टूटन? इतना वियोग?

एक सुबह रिशु अपनी शर्ट पर इस्त्री करने पूजा भाभी के यहां गया हुआ था। 

रिशु ने कहा “क्या बात है भाभी? कई दिनों से ठीक से दिख नहीं रहीं थी”, रिशु ने शरारत भरे लहजे में कहा। तभी पूजा भाभी ने बताया की उनके पति का एक्सीडेंट हो गया है। हालत गंभीर है, पैर में फ्रैक्चर, सर में टांके । बोलते बोलते पूजा भाभी फफक कर रो पड़ी।

रिशु एकदम हक्का बक्का रह गया की भाभी ने इतनी बड़ी बात बताई तक नहीं, फिर उसने भाभी को सांत्वना देते हुए ईश्वर पर भरोसा करने को बोला। 

भाभी ने धीरे से कहा, “भैया… अब शायद गांव जाना पड़े। यहां सब संभालना मुश्किल है…”

अगले दिन, जब पूजा भाभी कमरे का ताला बंद कर रहीं थीं, रिशु और मुस्कान सीढ़ियों पर खड़े थे। दोनों के गले में कुछ अटका हुआ था।

“भाभी…” रिशु बस इतना ही कह सका। 

पूजा मुस्कुराईं, “भैया, आप तो गुस्सा भी अपने जैसा करते हो… सीधा दिल तक आता है।”

और फिर वह चली गईं—पीछे छोड़ गईं कुछ अधूरे किस्से, कुछ अधूरे दिन। 

उस रात, मुस्कान खिड़की के पास बैठी थी। रिशु ने आकर पूछा, “क्या सोच रही हो?”

“ये मकान अब पहले जैसा नहीं लगेगा…” मुस्कान ने कहा। 

रिशु ने उसका हाथ थामा, और बोला – “हम भी तो एक वक़्त पर अजनबी थे।” 

“पर अब तुम ही मेरा घर हो…” मुस्कान की आवाज़ भर आई। 

तभी अगरबत्ती की खुशबू मन मोह गई। शायद नारायण भइया ठेले की पूजा कर बाज़ार जाने की तैयारी कर रहे थे। सब सामान्य सा हो गया था।

और शायद यही होता है—महानगर की इन संकरी गलियों में कुछ रिश्ते छतों पर नहीं, दिलों में बसते हैं।

कुछ मुलाकातें बेवजह होती हैं, पर उनका असर जीवनभर रहता है।

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सहारा एक हाथ का –  सोनिका देवी 

सुरेश कपड़े की एक छोटी सी दुकान चलाता था, जिससे वह अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। उसी दुकान की कमाई से पैसे इकठ्ठा कर के सुरेश ने अपनी बेटी की शादी भी करवा दी थी। उसका और उसके परिवार का गुजर बसर बड़े अच्छे से हो रहा था।

लेकिन फिर एक दिन अचानक उसके जीवन में तूफान आ गया। लगातार हो रही तेज और मूसलाधार बारिश से उसकी दुकान में पानी भर गया। दुकान का सारा सामान पूरी तरह पानी में डूब कर खराब हो गया। सुरेश के लिए जैसे सब कुछ ही खत्म हो गया।

वह पूरी तरह बर्वाद हो गया था। अपनी जमा पूंजी भी वह बेटी की शादी में लगा चुका था। अब उसके पास परिवार का पालन-पोषण करने का कोई साधन नहीं बचा था। वह टूट गया था, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने सोचा कि वह फिर से सब कुछ नए सिरे से शुरू करेगा लेकिन इस बार उसके पास कुछ भी नहीं था सिवाय आत्मविश्वास के।

वह लोगों को देखता था,उनसे मिलता था लेकिन किसी से भी नजरें नहीं मिलाता था। वह टूटा नहीं था, टूटने की कगार पर था। उसे बस इंतजार था कि कोई उसके काँधे पर अपना हाथ रख दे। फिर वह खुद को आगे बढ़ने से रोक न पाए।

एक दिन वह सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे बैठा था। वह बहुत ही उदास था। वहां सुरेश को उसके एक पुराने मित्र ने देखा। मित्र ने उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, “मित्र तुम हार क्यों गए? तुमने कुछ नहीं खोया है,अभी तुम्हारा आत्मविश्वास बचा है।

उसके मित्र के इन शब्दों ने उसे एक नई राह दिखाई। उसने हिम्मत कर फिर से शुरुआत की और धीरे-धीरे दुकान को फिर से शुरू किया। 

सुरेश अब समझ गया था कि जीवन में कभी हार नहीं माननी चाहिए। जब तक आत्मविश्वास है तब तक कुछ भी नामुमकिन नहीं है। वह टूटा नहीं था, टूटने की कगार पर था लेकिन उसके मित्र के एक हाथ ने उसे टूटने से बचा लिया।

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बोझ निगल गया – नितेश मोहन वर्मा

कंधे का बोझ कुछ पल के लिए उतार लेता था
कभी रेल की फर्श पर
बस की सीट के नीचे
भीड़ ज़्यादा हो तो गोद में
पर दिल का बोझ कैसे उतारता?
कहाँ रखता?
कौन सी फर्श? किसकी गोद?
किसे देता कुछ पल के लिए उधार?
वो बोझ उसके साथ आया था
कभी साठ ग्राम, कभी पाव किलो
कभी एक मन
बढ़ता ही गया
कल पिता ने बताया था
फोन पर
पिछले साल का सूखा
बहा ले गई इस साल बारिश
दिल का बोझ दो मन और बढ़ गया
अगर सूखा पड़ता
तो इस बोझ में कितना इजाफा होता?
यह आसमान का बाँध
किस पार्टी की सरकार ने बनवाया था?
कैसे टूट गया?
पर वो टूटा नहीं था
टूटने की कगार पर था
बस इंतज़ार था कोई काँधे पर अपना हाथ रख दे
फिर वो खुद को रोक न पाता
पर कहाँ है वो हाथ
और शायद ठीक भी है
टूटने की अभी इजाज़त नहीं है
बीड़ी सुलगा कर
उसने अल्ताफ राजा का गीत बजाया
परदेसी
और गीले पके भात से
गर्म उबले आलू निकाल लिए
छील कर, नमक तेल डाल
मसल दिया
और मसलता रहा
फिर निगल गया।


जीवन की चुनौती – पिंकी गिरी

कभी-कभार हम जीवन की परिस्थितियों से निराश होकर जीवन में हारे हुए से महसूस करने लगते हैं और हमें अंदर ही अंदर कई बातें परेशान करने लगती हैं। बस उस समय एक उम्मीद की रौशनी की तलाश में हम अपने विपत्ति के दिनों में अपने अंतर्मन को एक दिलासा देने का प्रयास करते हैं। कुछ इसी तरह ये कहानी भी ऐसे ही एक लड़के की है, जिसका नाम दिनेश है।

दिनेश एक मेहनती और समझदार किस्म का लड़का था, वह बिहार के एक छोटे से गाँव से था। कुछ सालों से वह दिल्ली में ही नौकरी कर रहा था। उसके पिता की मृत्यु को दो बरस गुज़र चुके थे। पिता के जाने के बाद उसपे जिम्मेदारियों का पहाड़ टूट पड़ा। 

गाँव में एक छोटी बहन और बीमार माँ रहती थी। उसका कभी-कभार काम पर भी मन नहीं लगता था, इसी वजह से उसकी नौकरी भी चली गई थी। उसने यह सब बात अपने घर पर बताई नहीं… आख़िर बताता भी क्या? शायद उसकी माँ परेशान हो जाती।

एक शाम का समय था। सूरज की लाली धीरे-धीरे गाढ़ी हो रही थी और दूर कहीं क्षितिज़ पर ये सूरज डूब रहा था। 

वही बैठकर अपने फ्लैट की बालकनी से देखता हुआ दिनेश उस साँझ के अँधियारे में खोता जा रहा था। 

जैसे-जैसे अँधेरा बढ़ रहा था, दिनेश को ऐसा लगा कि उसके जीवन में भी कोई अँधेरे की काली छाया फैलती जा रही है।

वह मन ही मन सोचने लगा “कैसा ये जीवन है, कैसी ये कश्मकश है?”

बस अभी वह टूटा नहीं था। टूटने की कगार पर था। इंतज़ार था की कोई काँधे पर अपना हाथ रख दे। फिर वो ख़ुद को रोक ना पाता।

यह सोचता हुआ अपने बेडरूम की तरफ़ बढ़ा। उसने घड़ी की ओर देखा। शाम के ७ बज रहे थे। उसने अपनी माँ को कॉल लगा कर घर का हाल पूछा और उसकी माँ ने उसे घर आने के लिए बोलते हुए कहा..!

“कब आ रहे हो बबुआ गाँव? बहुत दिन हो गए तुमको गाँव आए हुए …अब तो छठ भी नज़दीक आ गया है।”

दिनेश ने माँ को दिलासा देते हुए कहा – “अच्छा ठीक है माँ। मैं कोशिश करूँगा की कंपनी से छुट्टी ले सकूँ।” 

यह कहते हुए कॉल काट दिया। माँ से बात करने के बाद वह चिंतित हो उठा, उसने निराश मन से सोचा –  आख़िर घर पर जाकर माँ से क्या कहूँगा? पहले की तरह अब उसको त्यौहार अच्छे नहीं लगते थे, और ना ही गाँव जाना अच्छा लगता था। यही सब सोचते हुए वह गहरी नींद में चला गया उसे ये ख़ुद भी ज्ञात ना रहा।

छठ की तैयारी हो चुकी है। माँ ने बड़ी ही श्रद्धा और भक्ति से छठी मइया का व्रत रखा था। बहुत सुंदर और अनुपम नज़ारा था। सभी तरफ़ छठ के लोक गीत और ठेकुआ की खुशबू से पूरा गाँव ज्वार महक उठा था। शाम को छठ घाट जाने का समय आया और उसने अकेले ही छठ का डाला एक तरफ़ से उठाना चाहा। तभी दूसरी तरफ़ से झुका हुआ डाला कोई दोनों हाथों से उठाते हुए उसके सर के ऊपर रख दिया और बोला – 

“अरे बबुआ अकेले ही…मैं तो हूँ ना हमेशा तुम्हारे साथ।”

दिनेश चौककर गहरी नींद से उठकर बोल पड़ा ..पापा! 

उसने समय देखा। सुबह के ५ बज रहे हैं। वह एक सपना था जिसको देखने के बाद उसे दोबारा नींद नहीं आई। उसने फिर उसी बालकनी पर जाकर देखा। सूरज पूर्व दिशा से होते हुए धीरे-धीरे पूरे संसार को प्रकाशमय कर रहा था और उसके भी जीवन में एक रौशनी का आगमन हो आया था।

फिर से उसमें वही साहस और आत्मविश्वास जागा। उस दिन उसे महसूस हुआ की पापा उसे छोड़ कर कभी गए ही नहीं बल्कि वो तो हमेशा साथ ही थे। उनका शरीर नहीं तो उनका आशीर्वाद हमेशा उसके साथ है। अपनी मेहनत और लगन से उसने अच्छी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पा ली। 

अब वह भविष्य में आने वाली जीवन की हर चुनौती के लिए तैयार हो चुका था।

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ये थी कुछ कहानियाँ और कवितायें – हमारे पहले हिंदी कहानी प्रॉम्प्ट की। सभी लिखने वालों को धन्यवाद। साथ ही आप पाठकों का बहुत शुक्रिया – आपके समर्थन के बिना ये शब्द कहीं खो जायेंगे। ऐसे ही आपका साथ बना रहे। अपने सुझाव और विचार हमें भेजें और साथ ही पढ़ना न भूलें हमारी हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’

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