जीवन के अनुभवों को अपनी कविता के ज़रिए बयान करना चाहती हूँ – श्वेता सुखेजा

प्रतिज्ञान प्रकाशन में आपका स्वागत है। आज हम आपका परिचय एक ऐसी प्रतिभा से करवा रहे हैं जिनकी कविताएँ उनके जीवन के अनुभवों और गहन विचारों को दर्शाती हैं। वह हैं श्वेता सुखेजा। श्वेता जी अपनी कविताओं को अपने जीवन में हुए अनुभव से प्रेरित होकर लिखती हैं और जीवन के अनुभवों को अपनी कविता के ज़रिए बयान करना चाहती हैं।

उनकी चार कविताएँ – ‘किरदार‘, ‘जीवन‘, ‘ज़िन्दगी का रहस्य‘, और ‘बचपन‘ – हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं, रिश्तों की जटिलता, और बचपन की सादगी की एक मार्मिक यात्रा पर ले जाती हैं।

कवयित्री का परिचय

श्वेता सुखेजा जी हरियाणा के एक सरकारी महाविद्यालय में कंप्यूटर इंस्ट्रक्टर के पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने कम्प्यूटर साइंस में एम. फिल. की डिग्री प्राप्त की है। अपनी पढ़ाई के दौरान ही उनमें कविताएँ लिखने की रुचि जागृत हुई। श्वेता जी की विशेष रुचि संगीत और साहित्य सृजन में है, और वह हिंदी भाषा में लिखती हैं। आप उनसे ईमेल पर संपर्क कर सकते हैं।


चार कवितायें – श्वेता सुखेजा

1. किरदार

आए थे इस दुनिया में एक मौज के साथ,
हर कदम पर कोई मिला एक नए किरदार के साथ।
थामी थी उँगली एक किरदार ने ममता के साथ,
निभाया था फ़र्ज़ पूरा बिना किसी स्वार्थ के साथ।
था एक किरदार उस ममता के साथ,
जिसका हाथ था उस ममता की उँगली के साथ।
बनाया इस लायक़ कि रह सके इस दुनिया के साथ,
तो बांध दिया फिर एक नए किरदार के साथ।
थे अपनी मस्ती में एक नई दुनिया में,
पर बहुत किरदार जुड़े थे उस नए किरदार के साथ।
चल पड़ा था जीवन कुछ नई राहों पर,
खुश करने में लगे रहे अपने सच्चे किरदार के साथ।
पर हर शख़्स था अपनी ही मस्ती में,
कर रहा था अपनी ख़्वाहिश पूरी अपने नक़ली किरदार के साथ।
फिर कुछ आया जीवन में एक आशा लेकर,
शायद करने मेरी ख़्वाहिशें पूरी फिर से ममता के किरदार के साथ।

श्वेता जी जी पहली कविता मातृत्व का एहसास करवाती है। यह कविता रिश्तों और जीवन में अलग-अलग भूमिकाओं (किरदार) के महत्व पर प्रकाश डालती है। कवयित्री बताती हैं कि इस दुनिया में हर कदम पर कोई न कोई नए किरदार के साथ मिला । ममता के साथ उँगली थामने वाले एक किरदार ने बिना किसी स्वार्थ के अपना फ़र्ज़ पूरा किया । 

आगे चलकर, जीवन एक नए किरदार के साथ बँध गया और उस नए किरदार के साथ कई और किरदार भी जुड़े थे । यह कविता जीवन-यात्रा में सच्चे और नक़ली किरदारों के द्वंद्व को दर्शाती है, जहाँ कुछ लोग अपने सच्चे किरदार के साथ दूसरों को खुश करने में लगे रहे , वहीं कुछ लोग अपनी ख़्वाहिशें पूरी करने में अपने नक़ली किरदार के साथ व्यस्त थे ।


2. जीवन

आसमान में उड़ता पंछी लगता कितना प्यारा,
शायद वो भी तो होगा किसी के जीवन का सहारा।
उसे देखकर लगता कि वो है कितना आज़ाद,
काश मैं भी इक पंछी होता मन से निकले फ़रियाद।
पर क्या किसी ने सोचा कि वो भी तो इक प्राणी है,
उसका भी इक जीवन है और इस जीवन के लिए दाना-पानी है।
शायद वो भी सोचता हो कि काश मैं भी इक इंसान होता,
जो संघर्ष इस जीवन में शायद उस जीवन में न होता।
इस तरह हर प्राणी की अपनी अलग कहानी है,
जीवन का नाम है संघर्ष और यही सच्ची कहानी है।

‘जीवन’ कविता में, कवयित्री ने आज़ादी और संघर्ष के विषय को एक पंछी के माध्यम से व्यक्त किया है। 

पंछी को देखकर मन में यह फ़रियाद निकलती है कि काश मैं भी इक पंछी होता । हालांकि, कवयित्री यह भी विचार करती हैं कि पंछी भी एक प्राणी है जिसका अपना जीवन और दाना-पानी है । हर प्राणी की अपनी अलग कहानी है , और कविता इस सच्चाई पर बल देती है कि जीवन का नाम ही संघर्ष है और यही सच्ची कहानी है ।


3. ज़िन्दगी का रहस्य

जब हम पैदा हुए मुट्ठी में अपनी किस्मत लिए,
पर जब इस दुनिया को देखा तो सोचा के हम क्यों पैदा हुए,
इस दुनिया के क्या कहने इसके तो रंग हैं न्यारे,
न कोई अपना न कोई परायों का यहाँ रे।
मालूम नहीं क्यों ये सब भगवान ने बनाये हुए,
पर इस दुनिया को देखा तो हम क्यों पैदा हुए।
हर कोई अपने लक्ष्य के पीछे भाग रहा,
पर जीवन का क्या है रहस्य, यह किसी को नहीं पता।
क्या है जीवन, क्या है मृत्यु, यह रहस्य है गूढ़,
यह रहस्य वही जान पाये, जो कभी ना हो अचूक।
पर हम क्या समझें, हम मोह माया में समाये हुए,
पर इस दुनिया को देखा तो सोचा हम पैदा क्यों हुए।

यह कविता जीवन और मृत्यु के गूढ़ रहस्य पर विचार करती है। कवयित्री ने इस दुनिया के रंग न्यारे बताए हैं, जहाँ न कोई अपना है न कोई पराया । मुट्ठी में किस्मत लेकर पैदा होने के बावजूद, वह सोचती हैं कि हम क्यों पैदा हुए । यह कविता बताती है कि हम मोह माया में समाये हुए हैं और जीवन का रहस्य किसी को नहीं पता ।


4. बचपन

बचपन की हर बात जब कभी याद आती है,
इन आँखों को रुला कर ही जाती है।
बचपन की वो गलियाँ जिन पर खेल कूद कर बड़े हुए,
कभी इनको छोड़ना पड़ेगा ऐसा सोचते भी न थे।
सब साथी यूँ बिछड़ेंगे सोचा भी न था,
यादों के सिवा अब हाथ में कुछ भी न था।
गुड्डे-गुड़िया के खेल में यूँ लड़ते-झगड़ते थे,
पर एक दूसरे को मनाने पर गले मिला करते थे।
गुड्डे-गुड़िया के ब्याह रचाना, अपने मिट्टी के घर बनाना।
कभी रूठना तो कभी मनाना,
क्या बचपन को इस जीवन में इक बार ही था आना?
आज भी भगवान से मांगें यही दुआ,
मुझे इस बचपन में वापिस ले जा।

यह कविता बचपन की मीठी यादों और उनके बिछड़ने के दर्द को व्यक्त करती है। बचपन की गलियाँ, जहाँ खेल कूद कर बड़े हुए, उन्हें छोड़ना पड़ेगा ऐसा कभी सोचा भी न था । 

गुड्डे-गुड़िया के खेल, लड़ना-झगड़ना और फिर गले मिलना, साथ ही मिट्टी के घर बनाना और रूठना-मनाना, ये सब यादें आँखों को रुला जाती हैं। कवयित्री भगवान से दुआ करती हैं कि उन्हें इस बचपन में वापिस ले जाया जाए।

श्वेता सुखेजा जी की कविताओं में विचारों की गहराई और भावनाओं की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। उनके शब्द सीधे हृदय को छूते हैं और हमें अपने जीवन पर विचार करने के लिए प्रेरित करते हैं।


शुभकामना और अनुरोध

श्वेता जी की कविताएँ सरल भाषा में जीवन के गूढ़ सत्यों को छूती हैं, जो पाठक के दिल को सीधे प्रभावित करती हैं।

हम श्वेता सुखेजा जी को उनके साहित्यिक सफ़र के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं और आशा करते हैं कि वह अपनी कलम से जीवन के और भी गहरे अनुभव हमारे साथ साझा करती रहेंगी। आपकी रचनाएँ सचमुच प्रेरणादायक हैं।

हम अन्य लेखकों और कवियों से भी अनुरोध करते हैं कि वे अपनी अनमोल रचनाएँ प्रतिज्ञान प्रकाशन के साथ साझा करें। हम आपकी आवाज़ को पाठकों तक पहुँचाने के लिए तत्पर हैं!

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3 विचार “श्वेता सुखेजा: जीवन के अनुभवों को शब्दों में पिरोती एक कवयित्री&rdquo पर;

  1. बचपन पर कविता अत्यंत सुंदर सृजन है और भावपूर्ण भी | साधुवाद !

    बात तो सही है कि “अपना” बचपन नहींं लौटता , पर बचपन लौट है , मैंने बचपन दोबारा जीय है | आप भी मानोगे |
    बचपन फिर लौट आता है..
    बचपन भी लौट आता है, यह  प्रमाण मैं दे सकता हूँ,
    नतनियों संग हँसते खेलते, उसी जमाने में जा सकता हूँ।
    फिर गुड्डे-गुड़िया सजते हैं, फिर मिट्टी के घर बनते हैं,
    उनकी हँसी में अपना बचपन, मैं रोज़ नया गढ़ता हूँ।
    सोचा था बचपन बीत गया पर वह तो लौट ही आया, 
    नतनियों की मुस्कानों में, फिर वही चन्दा  मुस्काया।

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