इंतज़ार खत्म हुआ! ‘शब्द-शिल्पी’ के लिए हमें कुल ४७ आवेदन प्राप्त हुए, जिनमें से हमने १४ सर्वश्रेष्ठ लघु कथाओं का चयन किया है। ‘शब्द-शिल्पी’ के प्रथम संस्करण को एक बड़ी सफलता बनाने के लिए हम सभी लेखकों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हैं। यह निश्चित रूप से समकालीन हिंदी साहित्य में मील का पत्थर साबित होने वाला एक बेहतरीन कथा-संग्रह होगा।
प्रत्येक कहानी को पढ़ने के लिए कृपया नीचे दी गई तस्वीरों पर क्लिक करें।
यौन भूख – गगन शुक्ल ‘दीप’
उपासना एक्सप्रेस – सुबोध कुमार सिन्हा
तीस दिनों का सत्यवान – मनीषा पाण्डेय
बांके – नमो नारायण दीक्षित
एंड ऑफ 9:15 – रश्मि शुक्ला ‘सैयाही’
वह एक बुकमार्क – पिंकी गिरी
पावनी – पूजा शर्मा
दो घंटे – नेहा आदेश
किताबें खुद चुनती हैं – रितेश सिंह
वो बुकमार्क – माया राठौर
गीतांजलि – हर्षा बागडे
व्यापारी के शब्द – मीनल गुप्ता
स्मृति रेखा – मनीषा पांडेय
खोया हुआ – मनीषा पांडेय
आशा है कि आप ‘शब्द-शिल्पी : प्रथम संस्करण‘ के लिए हमारे प्रतिभाशाली रचनाकारों द्वारा लिखे गए इन सुंदर और मनमोहक कथा-रूपों का पूरा आनंद लेंगे। इन विशेष प्रॉम्प्ट्स को अपनी रचनात्मकता से एक सजीव कहानी में ढालने के लिए हम सभी लेखकों के कठिन परिश्रम और उत्कृष्ट लेखन के प्रति पुनः हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।
कहानियाँ आपको कैसी लगीं, कमेंट सेक्शन में अपनी राय और प्रतिक्रिया हमारे साथ ज़रूर साझा करें। आपकी प्रतिक्रियाएँ हमारे लेखकों का उत्साह बढ़ाएंगी। यह तो बस ‘शब्द-शिल्पी’ की एक शुरुआत थी, हम बहुत जल्द आपके लिए ‘सीज़न 2’ लेकर लौटेंगे!
शब्द-शिल्पी प्रॉम्प्ट्स
प्रतिज्ञान को अपने कथा-संग्रह के लिए तलाश थी उभरते कहानीकारों की। ऐसे लेखक और लेखिकाओं की जो आम किरदारों को महानायक का चोला पहना कर साहित्य के मंच पर प्रस्तुत कर सकें। हमें आपके ख़यालों की उड़ान देखनी थी। हमें आपके शब्दों की गहराइयों में गोते लगाने थे। लेकिन उससे पहले, समकालीन हिंदी साहित्य की सेवा में जुटे आप जैसे रचनाकारों में से कुछ का चयन करना था। यह कहानी लेखन अभ्यास उसी चयन प्रक्रिया का अहम हिस्सा था।
आपको हमारे दिए गए प्रॉम्प्ट्स पर अपनी कहानी लिखनी थी – कम से कम ८०० शब्दों में। कहानी स्वरचित और अप्रकाशित होना अनिवार्य था।
सम्मिलित कहानियों को पढ़कर हमें अपने कथा-संग्रह के लिए कहानीकारों का चयन करना था। आपको अपनी कहानी ३१ अगस्त २०२६ से पहले हमें ईमेल द्वारा प्रेषित करनी थी। आप किसी एक या सभी प्रॉम्प्ट्स पर लिख सकते थे।
हमारा कथा-संग्रह एक बेहद रोचक प्रस्तुति रहा है। इस सफर में प्रतिज्ञान के साथ चलने के लिए आप सभी का धन्यवाद।
शब्द-शिल्पी गद्य लेखन प्रतियोगिता के लिए हमने तीन प्रॉम्प्ट्स साझा किये थे।
पहला प्रॉम्प्ट –
शहर की उस भीड़भाड़ वाली मेट्रो में, जब सबकी नज़रें अपनी घड़ियों या फोन पर टिकी थीं, मेरी आँखें उस पुराने बुकमार्क पर थम गईं जो ठीक मेरे सामने खड़ी एक अजनबी की किताब से नीचे गिरने ही वाला था। उस बुकमार्क पर मेरा ही नाम लिखा था, और वह लिखावट भी मेरी ही थी जिसे मैंने बरसों पहले कहीं खो दिया था।
दूसरा प्रॉम्प्ट –
ड्राइंग रूम का मंज़र किसी बुरे सपने जैसा था। सफेद कालीन अब सुर्ख लाल हो चुका था और कमरे के बीचों-बीच वह बेजान शरीर पड़ा था जिसे मैं दुनिया में सबसे ज़्यादा प्यार करता था। मेरे कांपते हाथों में वही चाकू था जिससे वार किया गया था, लेकिन सबसे डरावनी बात यह नहीं थी। डरावनी बात यह थी कि मुझे याद ही नहीं था कि पिछले दो घंटे में मैं कहाँ था और मैंने क्या किया था।
तीसरा प्रॉम्प्ट –
बांके बाबु का ये रिश्ता भी होते-होते रह गया। विवाह की तारीख पक्की होने ही वाली थी जब सत्यवान बांके बाबु ने होने वाली श्रीमति की तारीफ़ में उन्हें तंदरुस्त कह दिया। उनको लगा सही शब्द का चयन किया है लेकिन हर बार के जैसे कुल्हाड़ी पर अपना पाँव दे मारा। मरणासन्न माताजी को वचन दिया है कि तीस दिनों में बहू को साथ लेकर गाँव आयेंगे। अब उनकी सारी उम्मीदें शनिवार शाम को शहर के पाँच सितारा होटल में आयोजित ‘स्पीड डेटिंग’ उत्सव पर टिकी हैं।
तीसरा प्रॉम्प्ट केवल उन लेखकों के लिए था जो व्यंग्य या हास्य (Satire/Humor) में अपनी कलम आज़माना चाहते थे।
प्रतिज्ञान एक ‘डिजिटल फर्स्ट’ हिंदी प्रकाशन है। हम हर महीने अमेज़न किंडल पर हमारी हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ प्रकाशित करते हैं। आप आज ही पढ़ें। पढ़िए प्रतिज्ञान।