कवयित्री श्वेता सुखेजा की नई हिंदी कविता ‘दादी की विरासत’ में पढ़ें देश विभाजन के दौरान उनकी दादी के संघर्ष और साहस की कहानी।
हिंदी साहित्य की दुनिया में अपनी छाप छोड़ रहीं श्वेता सुखेजा का नाम हमारे पाठकों के लिए नया नहीं है। इससे पहले, उनकी चार भावपूर्ण कविताएँ हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुकी हैं, जिन्हें आपने बहुत स्नेह दिया है। अपनी रचनाओं के माध्यम से श्वेता जी हमेशा जीवन के अनछुए पहलुओं को छूने का प्रयास करती हैं, और इसी क्रम में, आज हम आपके सामने उनकी एक अत्यंत व्यक्तिगत और मार्मिक कविता प्रस्तुत कर रहे हैं— ‘दादी की विरासत’।
यह कविता श्वेता जी की दादी को समर्पित है, जिन्होंने भारत के विभाजन की त्रासदियों का सामना किया और उन मुश्किलों से निकलकर एक नए जीवन की शुरुआत की। श्वेता जी ने दादी के मुख से सुने उन पलों और कहानियों को कविता का रूप दिया है, ताकि यह बीता हुआ क़िस्सा आज अपनों तक पहुँच सके।
आइए, हम सब मिलकर श्वेता सुखेजा की इस रचना के माध्यम से इतिहास के उस दर्दनाक अध्याय और एक साहसी महिला के अटूट हौसले को महसूस करें।
दादी की विरासत – श्वेता सुखेजा
कुछ लिखना चाहती हूँ उन पलों को जो सुने थे
उस झुर्रियों वाली, सिलवटों वाली दादी के मुख से।
हमारा था बचपन और उनका बुढापा था,
सुनने और सुनाने को एक अजब क़िस्सा था।
सुनाती थीं अपने बचपन की कहानियाँ,
सुनकर लगता था उनके मन में हैं पुरानी निशानियाँ।
उनका क़िस्सा सुनाना,
और मेरा उन क़िस्सों में पहुँच जाना।
वो पुराना घर, वो नदी का किनारा और वो पेड़ पर झूला था।
मैं भी उस घर, नदी और पेड़ के साये में हूँ यही लगता था।
उनका वो घर और बचपन छोड़ कर आना,
था बहुत दुख का पल, सुन कर आता था रोना।
बताती थीं कैसे वो निकले उन गलियों से सब समेट कर,
जान बचाना था ज़रूरी ऐसे क्षण पर।
पर ऐसा दृश्य जब वो हमे सुनाती थीं,
सुनकर हमारी भी रूह काँप जाती थी।
दृश्य था उस रेलगाड़ी का जिस पर सवार होकर था जाना,
पर क्या पता था उस पर मौत को था पीछे आना?
लेकर तलवारें हाथों में मार रहे थे, काट रहे थे,
घूँघट में छुपी उनकी आँखें ये सब ताक रही थीं।
शायद उस भगवान ने था उन्हें बचाना,
थी एक देवी जिनको था माँ बनकर उनको अपनी बेटी बताना।
निकल गई उस मौत के मुँह से, चल पड़ी इक नई राह पर,
थे आूँस आँखों में क्योंकि जीना था मुश्किल बचपन पीछे छोड़ कर।
पहुँच गई इक नई जगह, शुरू हुआ एक नया जीवन,
थमा दिया उनका हाथ एक नई ज़िन्दगी के संग।
मेरा जीवन भी उनकी ज़िन्दगी का एक हिस्सा है,
मकसद है अपनों को बताना, बीता हुआ जो क़िस्सा है।
कविता की समीक्षा
‘दादी की विरासत’ सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि विभाजन के दौर का एक ज़िंदा दस्तावेज है, जो एक दादी की झुर्रियों वाली आँखों में सिमटी यादों को खोलकर रख देता है। कविता हमें उस दौर में ले जाती है जब ‘उनका बुढ़ापा था’ और ‘हमारा बचपन’, और सुनने-सुनाने का एक ‘अजब क़िस्सा था’।
कवयित्री ने बड़े ही मार्मिक ढंग से उस बचपन के घर, नदी के किनारे और झूले की यादों को दर्शाया है, जिन्हें छोड़कर आने का पल ‘बहुत दुख का’ था और ‘सुन कर रोना आता था’। सबसे हृदय विदारक दृश्य उस रेलगाड़ी का है, जिस पर सवार होकर लोग जा रहे थे, लेकिन ‘क्या पता था उस पर मौत को था पीछे आना?’
कविता में विभाजन की क्रूरता—’लेकर तलवारें हाथों में मार रहे थे, काट रहे थे’ —को दर्शाया गया है। यह सुनकर ‘हमारी भी रूह काँप जाती थी’। लेकिन इस अंधेरे में भी उम्मीद की एक किरण दिखती है, जब एक ‘देवी’ माँ बनकर उन्हें अपनी बेटी बताती हैं और वह ‘उस मौत के मुँह से निकल’ जाती हैं।
यह कविता सिर्फ दुख का वर्णन नहीं करती, बल्कि एक नई जगह पहुँच कर, नया जीवन शुरू करने और पिछली पीढ़ी के संघर्ष को ‘मक़सद’ बनाकर वर्तमान पीढ़ी तक पहुँचाने के महत्व को भी बताती है।
श्वेता जी ने अपनी दादी के साहस, जीवनदान और नई राह पर चलने की जिजीविषा को खूबसूरती से शब्दों में उतारा है। यह कविता हमें सिखाती है कि पिछली पीढ़ी के संघर्ष ही हमारी विरासत हैं।
श्वेता सुखेजा जी, आपकी दादी के प्रति समर्पित यह कविता और उनका संघर्ष साझा करने के लिए हम प्रतिज्ञान की ओर से हृदय से आभारी हैं। हम आशा करते हैं कि भविष्य में भी आपकी अनूठी रचनाएँ हमें पढ़ने को मिलती रहेंगी।
यह कविता आपको कैसी लगी? क्या आपके परिवार में भी ऐसे अनुभव या अनसुनी कहानियाँ हैं? हमें टिप्पणी में ज़रूर बताएं।
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