एक तस्वीर, ६ रचनाएँ। उस गरीब बूढ़े की आँखों में झाँकिए जिसके संघर्ष और अकेलेपन को ५ कवियों और १ कहानीकार ने अपनी मार्मिक कलम से आवाज़ दी है। हृदयस्पर्शी रचनाओं का संग्रह।

कला और साहित्य की शक्ति इसी में है कि वह एक पल को, एक चेहरे को, एक भावना को हजारों शब्दों में जीवित कर दे। कुछ दिन पहले, हमने अपने रचनाकार समुदाय के सामने एक साधारण-सी, मगर गहरी तस्वीर साझा की थी: एक बुज़ुर्ग आदमी का चेहरा, जिसकी आँखों में गरीबी, अकेलापन और जीवन भर का अनवरत संघर्ष स्पष्ट रूप से झलक रहा था। हमने उनसे उस तस्वीर को अपनी-अपनी भावनाओं और शब्दों में ढालने का आह्वान किया।

एक बुज़ुर्ग की तस्वीर जिस पर कहानी या कविता लिखनी थी

हमें यह साझा करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि हमें इस प्रांप्ट पर अभूतपूर्व प्रतिक्रिया मिली। आज, हम आपके सामने ६ प्रतिभाशाली रचनाकारों की प्रस्तुतियाँ एक साथ लेकर आए हैं—जिनमें पाँच हृदयस्पर्शी कविताएँ और एक मार्मिक कहानी शामिल है। इन सभी ने उस चेहरे की खामोशी को, उसके एकाकीपन को और उसके भीतर छुपे अदम्य साहस को अलग-अलग आयाम दिए हैं।

ये रचनाएँ केवल शब्द नहीं हैं; ये संवेदनाएँ हैं, जो हमें जीवन के उस पहलू से जोड़ती हैं जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। आइए, इन रचनाओं के माध्यम से उस बुज़ुर्ग की दुनिया में झाँकें, उसकी आँखों की नमी को महसूस करें और उसके संघर्ष को सलाम करें।

रचनाकारों के नाम


ख़्वाब (कविता) – कनक अग्रवाल

क्या कहा?
मुस्कुरा दूँ, एक फोटो लेनी है!
साहब सदियाँ हुई ये लब मुस्कुराना भूल गए हैं
जब जब कोशिश की
आँखों की बेचारगी नज़र आयी लबों पर

बहुत मुश्किल है हरहराती नदी पर बाँध बनाना
और ये जतन करना होता है रोज़ हमें

वो क्या है न, आँसू दया की भीख देते हैं
और एक मज़दूर चाहे जितना कमज़ोर हो
पर स्वाभिमान का बोझ आसानी से उठा सकता है
देह कमज़ोर हो सकती है हमारी
पर इरादे
इरादे अटल हैं हमारे

एक गरीब की मुस्कुराती तस्वीर
ख्याति दिला सकती है आपको
पर न टूटने, न झुकने की ज़िद
जलाये रखती है हमारे घरों के चूल्हे

भरे पेट और चमकती आँखों से
आप देखिये ख्वाब अपनी प्रसिद्धि के

और हम देखते हैं ख़्वाब
दो जून रोटी के और उस असली मुस्कुराहट के
जो आती है हमारे बच्चों के लबों पर
और कर देती है तैयार हमें
अगले दिन फिर जुतने के लिए
ज़िन्दगी के जुए में।

कनक जी, आपकी कविता ‘ख़्वाब’ स्वाभिमान और संघर्ष की ज़िद को सलाम करती है। आपने दर्शाया है कि असली ताकत चेहरे की मुस्कुराहट में नहीं, बल्कि मुश्किलों के सामने न झुकने वाले मज़बूत इरादों में होती है। यह रचना गरीबी में भी गरिमा और बच्चों के लिए त्याग के सुंदर ‘ख़्वाब’ को सजीव करती है। अद्भुत अभिव्यक्ति!

कनक जी की रचनायें आप इंस्टाग्राम पर पढ़ सकते हैं।


भीड़ के उस पार (कहानी) – अनीता कवात्रा

शहर की भीड़ में हर चेहरा किसी मंजिल की तरफ भागता नज़र आता है।
कोई ऑफिस के लिए भाग रहा होता है, कोई बस पकड़ने के लिए, और कोई ज़िन्दगी की जद्दोजहद में कहीं खोया हुआ होता है।
उसी भीड़ में एक चेहरा ऐसा था, जिसे मैं रोज़ देखती थी, मगर कभी देखा नहीं।

वह एक बूढ़ा आदमी था – स्टेशन के बाहर, वही पुराना कोना, वही टूटी चारपाई और एक अल्युमिनियम का प्याला, जिसमें कभी चाय होती, कभी सिक्के।
चेहरे पर गहरी झुर्रियाँ, आँखों में एक सन्नाटा।
वह हर आते जाते मुसाफिर को देख कर हल्का सा मुस्कुराता, जैसे कह रहा हो, “रुको ज़रा, हाल तो पूछ लो…..”
पर कोई रुकता नहीं था।
मैं भी नहीं।

रोज़ कॉलेज जाते वक्त में वहीं से गुज़रती थी।
कभी नज़रें मिलतीं तो नज़रें झुका लेती।
दिल में एक हल्की सी झिझक होती – कहीं वो कुछ माँग ना ले।
और मैं, अपने कानों में हेडफोन लगाकर, दुनिया की आवाज़ों से भी बच निकलती थी
शायद मुझे डर था – कि अगर मैं सुन लूँ, तो कुछ महसूस भी कर लूँगी।

एक सुबह, बहुत ठंड थी।
धुंध के परदे में सब कुछ धुंधला सा लग रहा था।
मैं जल्दी में थी, ट्रेन पकड़नी थी।
अचानक स्टेशन के पास भीड़ लगी दिखी।
जिज्ञासा में मैं भी पास गई।
वह वही बूढ़ा था – ज़मीन पर पड़ा हुआ, काँपता हुआ, उसके पास एक छोटा बच्चा बैठा रो रहा था।
लोग तमाशा देख रहे थे, कोई आगे नहीं बढ़ा।

मैं झुककर पास गई।
बूढ़े ने बड़ी मुश्किल से आँखें खोली।
“बिटिया! ये बच्चा भूखा है। मेरे हिस्से की चाय इसे दे दो।”
और मुस्कुराया।
वह मुस्कान किसी फरिश्ते जैसी थी – शांत, सुकून भरी, और अंतिम।

उसने धीरे-धीरे आँखें मूँद लीं।
उसकी साँसें ठंडी हवा में खो गईं।
मुझे लगा जैसे शहर की भीड़ पहली बार रुक गई हो।

बाद में मालूम हुआ – वह बच्चा अनाथ था, और वही बूढ़ा कई महीनों से उसे पाल रहा था।
भीख में मिले पैसों से दोनों जीते थे – एक वक्त की रोटी, एक वक्त की दुआ।
लोग कहते थे, वह पहले स्कूल का अध्यापक था, जिसने अपनों को खोकर सड़कों पर आसरा लिया।
और मैं? मैं सिर्फ देखती रही, कभी समझा नहीं।

उस दिन मैंने पहली बार महसूस किया –
भीड़ में जो सबसे कम दिखते हैं, वही सबसे बड़े इंसान होते हैं।
हम जिनसे मुँह मोड़ लेते हैं, वही हमें इंसानियत का असली मतलब सिखा जाते हैं।

अब जब भी स्टेशन से गुज़रती हूँ, मैं उस जगह पर एक फूल रख देती हूँ।
कभी उसके लिए, कभी अपने लिए –
क्योंकि शायद सबसे बड़ा गुनाह किसी का ना देखना होता है।

अनीता जी, आपकी कहानी ‘भीड़ के उस पार’ संवेदनशीलता और अनसुनी दास्तानों की आवाज़ है। आपने बड़ी कुशलता से दर्शाया है कि कैसे ‘देखना’ और ‘महसूस करना’ दो अलग चीज़ें हैं। कहानी का अंत, जहाँ बूढ़े की ‘फरिश्ते जैसी’ अंतिम मुस्कान और उसका निस्वार्थ त्याग सामने आता है, पाठक को गहरे तक झकझोर देता है। यह रचना हमें भीड़ के शोर में इंसानियत की असली आवाज़ सुनने का पाठ पढ़ाती है। बेहतरीन प्रस्तुति!

अनीता जी की रचनायें आप इंस्टाग्राम पर पढ़ सकते हैं।


मजबूरी (कविता) – रेखा कुंडू

हँसना उसकी मजबूरी
रोए तो उसके आँसू पोंछे कौन

जीना उसकी मजबूरी
मरना चाहे तो उसके परिवार को संभाले कौन

थक गया है फिर भी आराम नहीं
वो सो गया तो कमाए कौन

गली-गली भटका वो भूखा प्यासा
उसकी भूख प्यास मिटाए कौन

सब ने जात पूछी उसकी
पर इंसानियत का फ़र्ज़ निभाए कौन

दिन रात कमाना है उसकी मजबूरी
वो जानता है अगर मैं मर गया
तो घर का सहारा बनेगा कौन।

रेखा जी, आपकी कविता ‘मजबूरी’ उत्तरदायित्वों के भारी बोझ और अकेलेपन को बहुत ही सीधे और मार्मिक ढंग से सामने रखती है। आपने दर्शाया है कि कैसे एक गरीब व्यक्ति के लिए हँसना, जीना और यहाँ तक कि आराम करना भी एक मजबूरी है, जो केवल परिवार के प्रति उसके अटूट दायित्व के कारण बनी रहती है। यह रचना उस अदृश्य त्याग को सलाम करती है जो हर दिन किया जाता है। सराहनीय रचना!

रेखा जी की रचनायें आप इंस्टाग्राम पर पढ़ सकते हैं।


मैं, एक पिता (कविता) – सोनिका शर्मा

जिम्मेदारियों का बोझ लिए चलता रहा उम्र भर
मैं रुका नहीं, लड़ता रहा हिम्मत की डोर पकड़
दायित्व निभाता रहा, अपने सब ख्वाब भुला कर
मगर कभी भागा नहीं परेशानियों से डर कर।

तपती धूप में जला, बारिश में भीगा
भीड़ में हँसा, तन्हाइयों में चीखा
कभी रुखा सूखा, कभी खाया तीखा
मगर कभी हारा नहीं, किसी मुसीबत से घबरा कर।

पतझड़ में अपनी ख्वाइशों को गिराया
सावन में अपने आंसुओं को छुपाया
बहार आई, खुद को फिर से झुक कर उठाया
मगर कभी बदला नहीं, किसी मौसम का रुख देख कर।

ना दिन में बैठा, ना सोया रातों को मैं चैन से
ना जलते सूरज से डरा, ना खुले काले आसमान से
हर नई जिम्मेदारी को संभाले रखा मैने ध्यान से
मगर कभी टूटा नहीं मैं सफ़र के किसी पड़ाव पर।

जब तक चल सका, निरंतर चलता रहा
गिरा बहुत बार, गिरकर संभलता रहा
हर फर्ज़, हर कर्तव्य निभाता रहा
मगर अब किनारा न करना, मुझे बोझ समझ कर।

सोनिका जी, आपकी कविता ‘मैं, एक पिता’ पिता के अडिग समर्पण और सहनशीलता का जीवंत प्रमाण है। आपने जिस तरह से ‘मौसमों’ के रूपक का उपयोग करके जीवन के उतार-चढ़ावों और जिम्मेदारियों के बोझ को दर्शाया है, वह हृदयस्पर्शी है। यह रचना बताती है कि कैसे एक पिता अपनी इच्छाओं को भुलाकर भी कभी हार नहीं मानता और अंत तक अपने दायित्वों को निभाता रहता है। शक्तिशाली और भावुक अभिव्यक्ति!

सोनिका जी की रचनायें आप इंस्टाग्राम पर पढ़ सकते हैं।


वक्त की मुस्कान (कविता) – वरुण कुमार द्रविड़

उसके चेहरे पर झुर्रियाँ नहीं,
जैसे वक्त ने अपने दस्तखत किए हों
हर लकीर में एक कहानी है –
मिट्टी, मेहनत और यादों की निशानी है।

कंधे पर गमछा,
जैसे बोझ नहीं, भरोसे की कहानी है।
आँखों में नमी है, पर लबों पर मुस्कान –
जैसे कह रहे हों,
“जीवन का स्वाद देख में ही मीठा होता है।”

कभी बेटा था, कभी पिता, कभी किसान,
अब बस इंसान है –
जो हर सुबह सूरज को देखता है
और कहता है
“तू भी रोज़ लौट आता है,
तो मैं क्यों हार मान लूँ?”

वो मुस्कुरा देता है
बिना किसी कारण के
क्योंकि उसने समझ लिया है –
ख़ुशी कोई घटना नहीं, आदत है।

वरुण जी, आपकी कविता ‘वक्त की मुस्कान’ आशावाद और जीवन की सहज स्वीकृति का सुंदर चित्रण है। आपने झुर्रियों को ‘वक्त के दस्तखत’ और मुस्कान को ‘आदत’ कहकर जीवन की फिलॉसफी को गहराई से व्यक्त किया है। यह रचना सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानना और हर सुबह को एक नए अवसर के रूप में देखना ही सच्ची खुशी है। अत्यंत प्रेरक रचना!

वरुण जी की रचनायें आप इंस्टाग्राम पर पढ़ सकते हैं।


आज का आदमी (कविता) – सुचि

आज का आदमी, भूख से लड़े
रोटी की तलाश में, गलियों में पड़े
पसीना बहाए, धूप की मार
फिर भी ना मिटे, पेट की पुकार।

आज का आदमी, काम से झुके
दिन रात, मशीनों के संग धुके
थककर भी, सपनों को सींचे नया
रास्ता कठिन हो, तो भी चले सदा।

आज का आदमी, प्यार को ढूंढे
रिश्तों की भीड़ में, दिल को छू ले
चेहरे पर मुखौटे, झूठ का खेल
सच्चा लगाव हो तो, किस्मत का मेल।

आज का आदमी, बोझ से झुका
ख्वाहिशों का जंगल, भीतर धंसा
मुस्कान दिखाए, मगर टूटा मन
सपनों के संग, ढोता जीवन।

आज का आदमी, फिर भी खड़ा
आंधियों के आगे, हौसला बड़ा
गिरे तो संभल कर, उठता वही
कल की सुबह का, भरोसा यही।

सुचि जी, आपकी कविता ‘आज का आदमी’ यथार्थवादी संघर्ष और अटूट जिजीविषा को बड़ी सच्चाई से बयान करती है। आपने वर्तमान जीवन की जटिलताओं—भूख, मशीनी जीवन, भावनात्मक दूरी—को दर्शाते हुए भी अंत में अदम्य साहस और भविष्य के प्रति भरोसे को स्थापित किया है। यह रचना सिखाती है कि चाहे मुश्किलें कितनी भी हों, ‘आज का आदमी’ कभी हार नहीं मानता। सत्यपरक और सशक्त रचना!

सुचि जी की रचनायें आप इंस्टाग्राम पर पढ़ सकते हैं।


इस मंच पर अपनी भावनाएँ और शब्द साझा करने वाले सभी रचनाकारों—कनक अग्रवाल जी, अनीता कवात्रा जी, रेखा कुंडू जी, सोनिका शर्मा जी, वरुण कुमार द्रविड़ जी और सुचि जी—का हम हृदय से आभार व्यक्त करते हैं।

आप सभी ने एक साधारण सी तस्वीर को छह असाधारण मानवीय अनुभवों में बदल दिया है। किसी ने बूढ़े के स्वाभिमान को आवाज़ दी, किसी ने उसके निस्वार्थ त्याग को कहानी में बुना, तो किसी ने उसके अडिग दायित्व और अंतहीन आशावाद को कविताओं के माध्यम से जीवंत किया।

यही साहित्य की शक्ति है—एक पल को, एक चेहरे को, संपूर्ण जीवन-दर्शन में बदल देना।

आपकी रचनाओं ने हमें याद दिलाया है कि जीवन की सबसे बड़ी कहानियाँ अक्सर भीड़ से दूर, खामोश चेहरों पर अंकित होती हैं। अपने लेखन को इसी संवेदनशीलता और गहराई के साथ जारी रखें। हमें विश्वास है कि आपकी कलम समाज को और अधिक संवेदनशील बनाती रहेगी।

आप सभी का फिर से धन्यवाद। हम भविष्य में आपके और सुंदर सृजन की प्रतीक्षा करेंगे।

शुभकामनाएँ!

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