मॉरीशस के षड्यंत्र से लेकर मुम्बई और पटना के कॉरपोरेट दफ्तरों की खींचतान तक! जानिए क्यों मुकुल रंजन का नया उपन्यास ‘हर शाख़ पर उल्लू बैठा है’ हिंदी कथा-साहित्य में एक अलग और सिनेमाई अनुभव लेकर आया है।

कॉरपोरेट सर्कस और लालसा पर एक तीखा व्यंग्य

हिंदी कथा-साहित्य में अक्सर कॉरपोरेट संस्कृति, मीडिया की जगमगाहट और उसके पीछे छिपे अंधेरे को उस गहराई व पैनेपन से चित्रित नहीं किया गया, जिसकी वह हकदार रही है। मुकुल रंजन का यह उपन्यास ‘हर शाख़ पर उल्लू बैठा है’ इसी कमी को न केवल पूरा करता है, बल्कि पाठक को एक ऐसी अनूठी और मनोरंजक यात्रा पर ले जाता है जहाँ व्यंग्य, थ्रिलर, तंज और यथार्थ का एक बेहद संतुलित मिश्रण देखने को मिलता है।

शीर्षक ही अपने आप में एक कहावत की याद दिलाता है,  “हर शाख़ पे उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुुलिस्ताँ क्या होगा!” उपन्यास की मूल आत्मा इसी एक पंक्ति के इर्द-गिर्द ताना-बाना बुनती है। यह एक ऐसी कॉरपोरेट व्यवस्था और उपभोक्तावादी संस्कृति की कहानी है, जहाँ महत्वाकांक्षाएँ बेकाबू हैं और हर कोई अपने निजी हितों व सनक के हाथों संचालित हो रहा है।

कथानक का ताना-बाना और शिल्प

उपन्यास की शुरुआत किसी धमाकेदार थ्रिलर जैसी होती है। मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुई की एक तूफानी रात, भारी हथियारों से लैस बदमाश, गोलियों की तड़तड़ाहट और षड्यंत्र का एक ऐसा माहौल, जो पाठक को शुरू में ही बाँध लेता है। एक नए क्षेत्रीय (भोजपुरी) टीवी चैनल ‘बिरहा’ को शुरू करने की पटकथा मॉरीशस के एक आलीशान विला में लिखी जा रही है, जहाँ बंदूकें टेबल पर रखी हैं और ड्रिंक्स के घूँट के साथ करोड़ों के सौदे तय हो रहे हैं।

कहानी इसके बाद मुम्बई के अंधेरी-चकाला के तंग कॉरपोरेट दफ्तरों से होती हुई बिहार की राजधानी पटना की गलियों तक का सफर तय करती है। वैश्विक मंदी के दौर में एक नए चैनल को ऑन-एयर करने की होड़, कर्मचारियों की खींचतान, बजट के लोचे, डेडलाइन्स का दबाव और दफ्तर के अंदर की राजनीति का जो दृश्य मुकुल रंजन ने खींचा है, वह अत्यंत जीवंत है।

बिना मुख्य घटनाक्रम (सस्पेंस) को उजागर किए यदि कहा जाए, तो यह उपन्यास केवल टीवी चैनल शुरू करने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन चरित्रों का दस्तावेज है जो खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हैं और इसे एक खेल समझते हैं।

जीवंत और बहुआयामी किरदार

मुकुल रंजन की सबसे बड़ी ताकत उनके द्वारा गढ़े गए किरदार हैं। हर पात्र की अपनी एक विशिष्ट बोली, लहज़ा और व्यवहार है जो उन्हें एक-दूसरे से पूरी तरह जुदा करता है:

  1. कर्णम सरस्वती: ‘बिरहा’ की चैनल हेड। आधुनिक, तीखी, महत्वाकांक्षी, हर बात पर अंग्रेजी के मुहावरे उछालने वाली और पर्स में जर्मन माउजर रखने वाली एक ऐसी बॉस, जो अपनी शर्तों पर काम करती है। मौर्यकालीन इतिहास और ‘गोइठे’ (गोबर के कंडे) के बीच का उसका मतिभ्रम उपन्यास के सबसे चुटीले व्यंग्यों में से एक है।
  1. अदल खटिक: एक युवा, प्रतिभावान और थोड़ा सनकी टेक्निकल डायरेक्टर। आईआईटी कानपुर से पढ़ा स्विमर, जो लम्बे बालों और जावा मोटरसाइकिल के साथ ज़िंदगी को अपनी शर्तों पर जीता है। वह आज के उस युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो सिस्टम से चिढ़ता भी है पर उसका हिस्सा बनने को मजबूर भी है।
  1. इल्तिजा ख़ाँ: जेएनयू से पढ़ी, मगध विश्वविद्यालय के हिंदी प्रोफेसर की बेटी। सिगरेट की चुस्कियों, ओल्ड मंक रम और बिना लाग-लपेट वाली मगही-हिंदी बोली के साथ वह उपन्यास की सबसे बिंदास और आकर्षक पात्र बनकर उभरती है।
  1. रमज़ान हलालख़ोर और बुलु मित्रा: रमज़ान मुम्बई का पूर्व गुंडा और अब ‘प्रतिष्ठित’ व्यवसायी, जिसकी जुबान पर बंबइया लहज़ा है। वहीं बुलु मित्रा एक आकर्षक, महत्वाकांक्षी पर तनाव से घिरा प्रमोटर है। इन दोनों की जुगलबंदी कॉरपोरेट जगत के खोखलेपन को उघाड़ती है।
  1. सुखविंदर सिंह चहल व अन्य: पंजाबी तड़का लगाते चहल साहब, पटना के ‘टेक-सेवी’ संस्कृति से दूर के कर्मचारी और हरबेसर बेहारी जैसे बुजुर्ग गिरमिटिया व्यापारी। ये सभी मिलकर उपन्यास को एक संपूर्ण भारतीय व वैश्विक कैनवास प्रदान करते हैं।

भाषा-शैली और संवाद

मुकुल रंजन का मनोरंजन उद्योग और पटकथा लेखन का तीन दशकों का अनुभव इस उपन्यास के पन्नों पर साफ झलकता है। उनकी दृश्य-लेखन शैली ऐसी है कि पाठक पढ़ते हुए दृश्यों को किसी फिल्म की तरह अपनी आँखों के सामने घटते हुए देखता है।

भाषा के मामले में लेखक ने जो प्रयोग किया है, वह काबिले-तारीफ है। उपन्यास में केवल एक तरह की हिंदी नहीं है; यहाँ आपको बंबइया टपोरी भाषा, बिहारी/मगही का देसीपन, पंजाबी तड़का, कॉरपोरेट अंग्रेजी और भोजपुरी का रस एक साथ चखने को मिलता है।

संवाद इतने चुटीले और धारदार हैं कि पाठक कई जगहों पर खुद को मुस्कुराने या ठहाके लगाने से रोक नहीं पाता। उदाहरण के लिए, इल्तिजा का कंप्यूटर वायरस से परेशान होकर कहना, “स्क्रीन पर फाइल सब अइसे उधिया रहा है जइसे कोसी में बाढ़ आया है…” कॉरपोरेट की औपचारिकता को देसी लहजे में पूरी तरह ध्वस्त कर देता है।

समीक्षात्मक निष्कर्ष

‘हर शाख़ पर उल्लू बैठा है’ उपभोक्तावाद, कॉरपोरेट महत्वाकांक्षाओं, मीडिया सर्कस और मानवीय मूर्खताओं पर कसा गया एक बेहद सटीक, मनोरंजक और विचारोत्तेजक तंज है। यह उपन्यास यह दिखाता है कि किस तरह बड़ी-बड़ी कपंनियों की इमारतों के पीछे निर्णय लेने वाले लोग खुद अपने ही द्वारा बिछाए जाल में उलझते चले जाते हैं।

मुकुल रंजन ने हिंदी उपन्यास लेखन को एक नया मोड़ और नया स्वाद दिया है। यह पुस्तक गंभीर साहित्यिक बोझ से मुक्त होकर, एक अत्यंत पठनीय, प्रवाहपूर्ण और सिनेमाई अनुभव प्रदान करती है। हर वह पाठक जो हिंदी में कुछ नया, आधुनिक और मनोरंजक पढ़ना चाहता है, उसे यह उपन्यास निराश नहीं करेगा।

लेखक परिचय : मुकुल रंजन

मुकुल रंजन मूल रूप से बिहार (भागलपुर) से ताल्लुक रखते हैं और पिछले लगभग तीन दशकों से मुम्बई के मनोरंजन उद्योग में बतौर लेखक और निर्देशक सक्रिय हैं। उनकी शुरुआती शिक्षा भागलपुर में हुई, जहाँ से वे पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे। बाद में उन्होंने मुम्बई के ‘भारतीय विद्या भवन’ से पत्रकारिता की पढ़ाई की, लेकिन उनका असली रुझान ‘फसानाख़्वाँ’ (कहानीकार) बनने की ओर था।

वे मुम्बई में पटकथा लेखक और निर्देशक के रूप में स्थापित हुए। उन्होंने चकरघिन्नी, महाचक्रवात, रजनी, कलिंग कथा, द लिटिल जीनियस जैसे कई लोकप्रिय टीवी शो व फिल्मों का लेखन व निर्देशन किया है। इसके अलावा वे कई वर्षों तक ‘स्टार स्पोर्ट्स’ के इन-हाउस स्क्रिप्ट राइटर भी रहे हैं। वर्ष २०२१ में उनका पहला अंग्रेजी उपन्यास ‘Cold Cock’ प्रकाशित हुआ था। ‘हर शाख़ पर उल्लू बैठा है‘ हिंदी भाषा में उनका पहला उपन्यास है, जो उनकी बहुआयामी प्रतिभा का जीवंत प्रमाण है।


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