प्रतिज्ञान के पिछले कुछ अंकों में आपने मातृत्व, अतृप्त भूख, नायक, सफर और अंत पर आधारित कई विचारोत्तेजक रचनाएं पढ़ीं। प्रतिज्ञान के अगले अंक में हम क्या प्रकाशित करने वाले हैं?
प्रतिज्ञान के आगामी अंक १५ के लिए आह्वान
सितम्बर २०२५ में हिंदी साहित्य का यह सफर आरम्भ हुआ था। एक संकल्प लिया था हमने कि समकालीन हिंदी रचनाकारों को एक समावेशी, बेहतर होता मंच प्रदान करना है। लिखने वाले और पढ़ने वाले इस सफर में साथ जुड़ते रहें और साहित्य का यह कारवां बढ़ता रहा। मंज़िलें अभी और भी हैं, सफर तो चलता रहेगा। नेतृत्व बदल सकता है, सूत्रधार बदल सकते हैं लेकिन सफर रुकना नहीं चाहिए। अब यह सिर्फ मेरी या आपकी ज़िम्मेदारी नहीं, हम सभी की है।
कल जब पहले अंक के पन्ने पलट रहा था तो सहसा ही ख़याल आया कि प्रतिज्ञान की सोच और वो पहला अंक एक प्रयोग ही तो था। कौन जानता था वो पहला कदम उठ कर कितना आगे बढ़ेगा, लड़खड़ायेगा, संभल जाएगा, या सरपट दौड़ लगाएगा। हाँ, वाकई एक प्रयोग था और अभी भी है। प्रयोग सिर्फ वैज्ञानिक क्यों करें? साहित्यकार क्यों नहीं?
इसी सोच से तय हुआ अंक १५ यानी नवम्बर २०२६ के प्रतिज्ञान के अंक का विषय – प्रयोग।
मेरा काम तो कुछ-कुछ हो गया। अब हमेशा की भाँति अपनी सोच आपके सुपुर्द कर रहा हूँ। आप सभी के ख़यालों का, आपकी सोच का, आपकी कलम का ‘प्रयोग’ देखना है और पाठकों तक पहुँचाना है। समय है। बहुत नहीं पर कुछ समय अवश्य है। आप अपनी स्वरचित, अप्रकाशित रचनाएँ हमें शुक्रवार, १३ नवम्बर की मध्यरात्रि तक ईमेल कर सकते हैं। रचना वर्ड फॉर्मेट (.doc / .docx) में होनी चाहिए। साथ ही ७० से ८० शब्दों में अपना परिचय भी भेजें। हमारा ईमेल है hello@pratigyan.com।
साहित्य में प्रयोग – कैसे?
एकदम सरल भाषा में कहा जाए तो प्रायोगिक लेखन साहित्य की वह विधा है जो पारंपरिक संरचनाओं, व्याकरणिक नियमों, कथा-शैली और स्थापित मानदंडों को चुनौती देती है। इसे आप साहित्य की दुनिया की ‘प्रयोगशाला’ कह सकते हैं, जहाँ लेखक भाषा और माध्यम के साथ नए-नए प्रयोग करके मानवीय संवेदनाओं और विचारों को व्यक्त करने के बिल्कुल नए रास्ते तलाशते हैं।
‘प्रतिज्ञान’ के संदर्भ में सोचें, जहाँ हम ‘प्रयोग’ (अंक १५) की बात कर रहे हैं, तो प्रायोगिक लेखन उसी रचनात्मक स्वतंत्रता और दुस्साहस का नाम है जो लीक से हटकर सोचने को मजबूर करता है।
आइए जानते हैं कि प्रायोगिक लेखन की मुख्य विशेषताएँ और इसके रूप क्या हैं:
1. प्रायोगिक लेखन की मुख्य विशेषताएँ:
- पारंपरिक आख्यान का खंडन: पारंपरिक कहानियों में एक निश्चित क्रम होता है – शुरुआत, मध्य और अंत। प्रायोगिक लेखन इस ‘क्रोनोलॉजी’ को तोड़ देता है। इसमें कहानी पीछे से शुरू हो सकती है, बीच से छलांग लगा सकती है, या बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हो सकती है।
- चेतना का प्रवाह: इसमें पात्रों के मन में आने वाले अनगढ़ विचारों, बिखरे हुए सपनों और अधूरी भावनाओं को ठीक उसी रूप में पन्ने पर उतार दिया जाता है जैसे वे मस्तिष्क में कौंधते हैं।
- रूप और विन्यास: प्रायोगिक लेखन केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहता। इसमें शब्दों के फॉन्ट, उनके आकार, पन्ने पर उनका स्थान और रिक्त स्थान का भी अर्थ होता है। कभी-कभी कविताएँ दृश्य कला का रूप ले लेती हैं।
- भाषा और व्याकरण की सीमाओं को तोड़ना: व्याकरण के नियमों को मोड़ना, नए शब्दों का सृजन करना, विराम चिह्नों का अनुपयोग या अति-उपयोग करना इस लेखन का हिस्सा है।
2. प्रायोगिक लेखन के प्रमुख रूप:
- अ-रेखीय कथाएँ: ऐसी कहानियाँ जिन्हें आप किसी भी पन्ने से पढ़ना शुरू कर सकते हैं (जैसे जूलियन कोरताज़ार का प्रसिद्ध उपन्यास Hopscotch)।
- दृश्यकविताएँ: कविताएँ जो कागज़ पर किसी आकृति (जैसे पेड़, सीढ़ी या वृत्त) के आकार में लिखी जाती हैं।
- मल्टी-वॉयस या सामूहिक दृष्टिकोण: एक ही कहानी को कई विरोधी आवाज़ों या दृष्टिकोणों से एक साथ बिना किसी स्पष्ट सूत्र के कहना।
- अधूरी या खंडित रचनाएँ: जहाँ रचना एक संपूर्ण गद्य या कविता न होकर केवल बिखरे हुए विचार-बिंदु होती हैं, जिन्हें पाठक अपने हिसाब से जोड़ता है।
3. साहित्य में इसका महत्व क्यों है?
- भाषा का विस्तार: प्रायोगिक लेखन यह साबित करता है कि भाषा स्थिर नहीं है; वह जीवंत है और उसे नए आयाम दिए जा सकते हैं।
- पाठक की सक्रिय भागीदारी: पारंपरिक उपन्यासों में पाठक केवल एक दर्शक की तरह कहानी पढ़ता है। प्रायोगिक लेखन में पाठक को खुद उलझन सुलझानी पड़ती है और वह रचना का सह-रचयिता बन जाता है। मेरी समझ से साहित्य में प्रयोग की मुख्य वजह यही होनी चाहिए।
- अनुपयुक्त को व्यक्त करना: कई बार पारंपरिक भाषा गहरे आघात, अवसाद या जटिल दार्शनिक सत्यों को बयां करने में असमर्थ होती है। ऐसे में प्रायोगिक लेखन के टूटे-फूटे रूप ही सच्चाई के सबसे करीब पहुँचते हैं।
साहित्य का इतिहास गवाह है कि आज जिसे हम ‘क्लासिक’ या पारंपरिक मानते हैं, वह अपने समय में एक ‘प्रयोग’ ही था।
अचानक आयी ‘प्रयोग’ की उस सोच के पश्चात मैंने काफी रिसर्च और मेहनत की है। किन्तु यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि ऊपर लिखी कोई भी बात या प्रायोगिक लेखन की परिभाषा आपको बाँधने के लिए नहीं लिखी गयी है। आपकी कलम, आपकी सोच, आपका साहित्य, और आप पूरी तरह स्वतंत्र हैं इस प्रयोग के लिए। तो चौका दीजिए, स्तब्ध कर दीजिए खुद को, मुझे, और हर साहित्य प्रेमी को। आपकी रचनाओं की बेसब्री से प्रतीक्षा है। किसी भी सवाल के लिए आप बेहिचक हमसे संपर्क कर सकते हैं।