इस सितम्बर महीने की पहली तारीख को हमने एक नयी पहल की – हमारे इंस्टाग्राम प्रोफाइल पर हमने हमारा पहला हिंदी पोएट्री प्रॉम्प्ट साझा किया।
आप में से जो भी लिखते हैं, फिर चाहे वो कवितायेँ हो, कहानियाँ, शायरी या कुछ और। आपने भी कभी न कभी हाथ में कलम पकड़ कोरे कागज़ से आँख-मिचौली खेली होगी। ये सभी लिखने वालों की समस्या है जिसे ‘राइटर्स ब्लॉक’ कहते हैं – लेखन अवरोध ।
हमने सोचा इस समस्या को हल करने की एक छोटी पहल की जाए – और शुरुआत हुई इस हिंदी पोएट्री प्रॉम्प्ट के साथ –
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा।
हमने इस प्रॉम्प्ट को ०१ सितम्बर २०२५ को इंस्टाग्राम पर साझा किया। हमने अनुरोध किया की इन पंक्तियों से प्रेरणा ले कर ४ से १२ पंक्तियों की कविता लिख कर हमें भेजिए। सभी कविताओं को हमारी वेबसाइट और इंस्टाग्राम पेज पर प्रकाशित किया जाएगा। साथ ही चुनिंदा कविताओं को शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली मासिक हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ में स्थान दिया जाएगा।
इससे बेहतर काव्य प्रेरणा और भला क्या चाहिए ?
इस हिंदी पोएट्री प्रॉम्प्ट के नियमों के अनुसार कविता भेजने की अंतिम तिथि ०७ सितम्बर थी। १३ कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनायें हमें भेजी हैं। आप सभी को प्रणाम और हार्दिक बधाई।
हिंदी पोएट्री प्रॉम्प्ट – रचनाकारों की सूची
मैं दर-ब-दर की ठोकरें खा कर चलता रहा
दिन-ब-दिन एक नया शख्स मुझमें ढलता रहा,
मंज़िल-ए-राह मुशर्रत हुई नहीं कभी
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा ।
- प्रियम मिश्रा
- प्रज्ञा शुक्ला – यादों का दरिया
- कुमुद बंसल – ग्रहण
- प्रियेश मालवीय – गुनाह
- सोनिका शर्मा – दर्द की हद
- नीता सेलौनी – शून्य
- अनीता कवात्रा – मेरी आवाज़
- प्रीति श्रीवास्तव – सैलाब
- नमो नारायण दीक्षित – मूक
- विनोद कोरडे – सन्नाटा
- कनक अग्रवाल – नियति
- संदीप कजाले – अनकही
- प्रिंस जैन – अजनबी
- वरुण कुमार द्रविड़ – ख़्वाब
प्रज्ञा शुक्ला – यादों का दरिया
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा
फिर भी तड़पते हृदय में
तेरी यादों का दरिया रहा
चुपचाप तुम ख़ामोश सी
रग रग में यूँ घुलती रही
मैं सहमा सहमा उम्र भर
एक साये में पलता रहा
तुम दीप माला थी मेरी
मैं जुगनू कोई खामखा
एक चाँद तेरी गोद में
मेरे जैसा ही ढलता रहा।
प्रज्ञा जी की कविताओं के लिए उन्हें इंस्टाग्राम पर फॉलो करें।
कुमुद बंसल – ग्रहण
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में भी तन्हा रहा
उजालों को जो ढूंढने निकला
सूरज पर भी ग्रहण था लगा
भटकता रहा मैं सुकून की तलाश में
बेचैनी समेटता रहा
गुरूर बिखर गया रेत सा
जिसे मैं मोती समझता रहा
नींद भी दूर रही आँखों से
ख्वाब का न पहरा रहा
न सो सका ना जाग सका मैं
ना जाने कैसे ये पहर गया
साँसें थोड़ी स्थिल रही
दिल थोड़ा भागता रहा
जो चूर हुआ मैं थक कर डर से
मौत से भी सामना हुआ।
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प्रियेश मालवीय – गुनाह
उतरा नहीं है बस्ता अभी
भारी मेरा कंधा रहा
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा
वो गुनाह जो मैंने किया भी नहीं
उसकी सजा भी सहता रहा
वो बात कहने की थी कबसे
बस मन में ही अपने कहता रहा
ये देह तो हो चुका है बड़ा कबसे
पर मन वही नन्हा रहा
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा।
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सोनिका शर्मा – दर्द की हद
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा
लोग हँसते रहे इर्द-गिर्द मेरे
मैं हंसी ठहाकों में भी सहमा रहा
कोई पहुँचा न मेरे दर्द की हद तक
दर्द मेरा सदियों से दबा रहा
दर्द की दवा करे कौन, है फुर्सत किसे
मुस्कुराहटों के साये में लेता पनाह रहा
मैं यहाँ भी पहुँचा खुशियाँ बांटने
दरिया दिल मेरा होता वहाँ तबाह रहा
मैं सबकी मुसीबत में पहले पहुँचा
यही मददगार होना मेरा गुनाह रहा।
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नीता सेलौनी – शून्य
वो चिल्लाये जा रही थी,
“मेरे सब्र का बाँध टूट चुका है,
नहीं रहना मुझे इस संयुक्त परिवार के चक्रव्यूह में अब एक मिनट भी..”
मैंने भी आवेग में कह दिया,
“हाँ! तुम आज़ाद हो।
वो सिसकती हुई बदहवासी में,
जो कपड़े सामान मिले
एक ही सूटकेस में ठूसकर निकल पड़ी,
मुड़कर देखा भी नहीं।
अब तो मेरी चीख भी खामोश रही,
मैं भीड़ में तन्हा रहा मानो।
घर के अन्य सदस्य मुझे समझा रहे
पर मेरा दिल और दिमाग़ तो उसके साथ ही हो लिए थे,
शून्य की ओर…।
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अनीता कवात्रा – मेरी आवाज़
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रही
हँसी के पर्दे के पीछे
दर्द मेरा अनकहा रह गया
कोई न समझा, कोई न सुना
रातें मेरी सुनसान हैं
सपनों के टुकड़े मेरी बाँहों में टूटते हैं
फिर भी मैं ज़िंदा हूँ
इस ख़ामोशी में भी
मैं अकेली नहीं
मेरी आवाज़ मेरे भीतर गूँज रही है
और मुझे हर सुबह जीने की ताकत देती है।
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प्रीति श्रीवास्तव – सैलाब
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा
चीख रक्त की तरह नसों में कौंध गई
आँसूओं के सैलाब आये
उसमें बहता अकेला मैं चला
शब्द न आवाज़ थी
वीभत्स एक वो वार था
एक ही बार में मेरे अंतर्मन के पार था
फिर क्या?
भीड़ ने मुझे ऐसे सताया
काफी शोर कर मेरे चीख को दबाया।
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नमो नारायण दीक्षित – मूक
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा
तुम थे कि मुकम्मल हम थे हुए
मानो अब तक नाकास रहा
तुम दिन का दिनकर बने मेरे
मैं रजनी में उपस्थित चांद रहा
फिर रुख परिवेश मुड़ा ऐसे
मैं तेरा तू मेरा न रहा
हालातों का रख हाथ अधर
वाचाल मूक मैं बना रहा
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा।
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विनोद कोरडे – सन्नाटा
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा
मुस्कुराहट सबको दिखी
बस दर्द था जो दबा रहा
यह कैसा समंदर है, लहरों में भी सन्नाटा है
दिल का हाल सुनाता किसको, हर एक का अपना दर्द है
मौन हुई आँखें शब्द नहीं थे
सफर में भी अब हमसफ़र नहीं थे
बस परछाई अब साथ रह गई
जो कहानी थी, कहानी रह गई
मेरे साथ अब मेरी तन्हाई रह गई।
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कनक अग्रवाल – नियति
नफ़रत और ज़ुल्म की,
आँधियाँ सहती रही
शिकवा औऱ शिकायत को,
दिल में दफ़न करती रही
दर्द और पीड़ा को,
नियति मानती रही
ख़ुद अपनी ही लाश को,
कांधे पर ढोती रही
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रही
लड़की होने का कर्ज,
ताउम्र मैं भरती रही!!
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संदीप कजाले – अनकही
मेरी चीख भी खामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा
कुछ लफ्ज़ थे कहने के लिए
चुप अल्फ़ाज़ों ने कितना दर्द सहा
ज़िन्दगी ऐसे ही बीत गयी
कई दिन आकर चले गए
कई रैना हाथों से फिसल गयी
कहना चाहते थे, जो हम उनसे
वो बात होठों में सिमट गयी
ये बेनाम सफर, जो था अनकहा
कल कुछ था, आज कुछ भी नहीं ।
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प्रिंस जैन – अजनबी
मेरी चीख भी ख़ामोश रही,
मैं भीड़ में तन्हा रहा।
लोग आते-जाते रहे नज़रों के सामने,
पर कोई भी मेरे लिए न ठहर सका।
लब हिले तो बहुत बार सही,
पर अल्फ़ाज़ गले में ही कैद रहे ।
आँखें नम होकर भी पूछना चाहती थीं,
मगर सवाल होठों तक न पहुँच सका।
हर मुस्कान नक़ली-सी लगती रही,
चेहरे सब अजनबी से लगने लगे।
भीड़ में रहकर भी मैं बस खोने लगा
दिल की सच्चाई कोई समझ न सका।
शोर बहुत था उस महफ़िल के भीतर,
पर मेरा सन्नाटा सबसे ऊँचा था।
लोग बहुत थे पास पर अहसास न थे,
दिल की तन्हाई कोई वहाँ बाँट न सका।
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वरुण कुमार द्रविड़ – ख़्वाब
मेरी चीख भी ख़ामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा
उसकी यादों का सपना मेरी आँखों में पलता रहा
मेरी रात तन्हा गुजरती रही
और दिन भी यूं ही यादों में तेरी ढलता रहा
मेरी चीख भी ख़ामोश रही
मैं भीड़ में तन्हा रहा
तेरी मोहब्बत का असर घटता नहीं, और बढ़ता रहा
जिक्र तेरा करना तो नहीं चाहता
मग़र ज़िक्र तेरा ही चलता रहा
था मैं नशे में चूर मगर ख़्वाब तेरा मेरे दिल को सताता रहा
मेरी चीख भी ख़ामोश रही,
मैं भीड़ में तन्हा रहा।
वरुण जी की कविताओं के लिए उन्हें इंस्टाग्राम पर फॉलो करें।
आप सभी रचनाकारों और पाठकों का हम अभिनन्दन करते हैं और तहे दिल से शुक्रिया। लेखक, पाठक, प्रकाशक – ये एक त्रिकोण हैं साहित्य का। हर एक की अपनी भूमिका है और एक दुसरे का साथ देना अनिवार्य है।
हम आगे भी हिंदी पोएट्री प्रॉम्प्ट की अपनी ये श्रृंखला जारी रखेंगे और साथ ही कहानियों की श्रृंखला भी शुरू करेंगे। हमसे जुड़े रहें और अपने सुझाव हम तक पहुंचायें।
वैसे ये कोई ज़रूरी नहीं की आप अगले कहानी या पोएट्री प्रॉम्प्ट की राह देखते बैठे। यदि आप अपनी कोई रचना हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित करना चाहते हैं तो तुरंत संपर्क करें।
प्रणाम!
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