हमारे पहले पोएट्री प्रॉम्प्ट, खामोश चीख, की सफलता के पश्चात ये सफर अब रुकने वाला नहीं है। कविताओं, ग़ज़लों, नज़्मों, कहानियों और ख्यालों का ये सिलसिला जो अब शुरू हुआ है, चलता रहेगा। कलमदारों और पाठकों का कारवाँ बनता रहेगा। 

मैंने कुछ दिनों पहले दुष्यंत कुमार जी की एक ग़ज़ल पढ़ी और फिर अपने यूट्यूब चैनल पर शहर की ज़िन्दगी पर दिग्गजों के शेर प्रस्तुत किये। आप मेरा वीडियो ‘अजीब शहर’ ज़रूर देखिये। दुष्यंत जी के साथ साथ इस वीडियो में मैंने निदा फ़ाज़ली साहब, बशीर बद्र साहब सहित अन्य शायरों के कुछ मशहूर शेर पढ़े हैं। 

तब मुझे ख़याल आया की हमारे नए ज़माने के रचनाकारों को भी ये मौका दिया जाए – शहर की ज़िन्दगी पर अपनी कविता और ख़याल लिखने का।  

उन्हें इन दोनों शब्दों का इस्तेमाल कर कोई शेर, कविता, नज़्म या ग़ज़ल लिखनी थी । 

तो लीजिये, पेश है मशहूर शायरों के साथ हमारे चुनिंदा रचनाकारों के अल्फ़ाज़। 


शहर पे शायरी – मशहूर शेर 

दुष्यंत कुमार जी ने शहर के संदर्भ में ऐसी ग़ज़लें लिखी हैं, जो सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ को दर्शाती हैं। उनकी एक प्रसिद्ध ग़ज़ल की पंक्तियाँ हैं: 

दुष्यंत कुमार जी की शहर पे शायरी

ये पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक हैं और बताती हैं कि वादों के विपरीत शहर में सभी को मूलभूत सुख-सुविधाएँ नहीं मिल पाती हैं।

यहाँ दरख़्तों के साए में धूप लगती है
चलें यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए

न हो क़मीज़ तो पाँव से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिए

दुष्यंत जी की यह ग़ज़ल भारतीय समाज और राजनीति पर एक गहरी टिप्पणी है।

शहर की ज़िन्दगी पर कुछ और मशहूर शेर 

शहर की ज़िन्दगी पर कुछ मशहूर शेर
जो मेरे गाँव के खेतों में भूक उगने लगी
मिरे किसानों ने शहरों में नौकरी कर ली
- आरिफ़ शफ़ीक़
दोस्तो तुम से गुज़ारिश है यहाँ मत आओ
इस बड़े शहर में तन्हाई भी मर जाती है
- जावेद नासिर
चुप चुप मकान रास्ते गुम-सुम निढाल वक़्त
इस शहर के लिए कोई दीवाना चाहिए
- निदा फ़ाज़ली
आप मज़लूम के अश्कों से न खिलवाड़ करें
ये वो दरिया हैं जो शहरों को निगल सकते हैं
- मुख़तार तलहरी

और अब पढ़िए शहर की ज़िन्दगी पर हमारे हिंदी पोएट्री प्रॉम्प्ट के प्रतिभागी रचनाकारों की कवितायेँ और खयाल। 


हिंदी पोएट्री प्रॉम्प्ट – रचनाकारों की सूची

क्या दिन गुज़ारे थे हमने अपने गाँव में
वो हरे-भरे पेड़ों की ठंडी-ठंडी छाँव में,

सादगी में होती थी कभी ज़िन्दगी बसर
आज शहर की चकाचौंध बढ़ी भाव में,

खेतों की पगठंडी पर जो दौड़ लगाई थी
वो बचपन खोया ज़िन्दगी के पड़ाव में,

बड़ी शान से गाँव में घूम आया करते थे
बड़ा स्नेह मिला उन अपनों के लगाव में,

जिनके नाम से हमें जानते थे गाँव वाले
नतमस्तक होते थे दादा जी के पाँव में,

आज कितना भी आगे निकल जाएँ हम
कुछ कमी लगती ज़िंदगी के हर दाँव में।

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शहर की रौनक़ों में तन्हाइयाँ भी बिक जातीं हैं,
ज़िन्दगी रोज़ हवस के सौदों में ढल जाती है।

रोज़ रोटी की हवस दौड़ बनाती है यहाँ,
साँस भी क़र्ज़ की क़ीमत में खरीदी जाती है।

रात नींदों से ज़ियादा हैं यहाँ सौदे-अदा,
दिन की उम्मीद तिजारत में ही ढल जाती है।

रिश्तों का नक़्श भी बाज़ार के सिक्कों पे टिका,
फ़ुर्सतें वक़्त के दर पे सदियों से मर जातीं है।

‘सिफ़र’ तेज़ रफ़्तार में इंसान बाकी है कहाँ,
बस फ़क़त दौलत के साए में उमर कट जाती है।

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शहर ने दी रफ़्तार, मगर चैन छीन लिया,
ज़िन्दगी ने चाहा सुकून, पर किस्मत ने घेर लिया।

शहर की गलियों में सच तलाशते रहे,
ज़िन्दगी के सफ़र में मृगतृष्णा ही मिली।

शहर की रोशनियाँ भी सायों में ढल गईं,
ज़िन्दगी की प्यास और दूर तलक चल गई।

शहर में हर चेहरा आईने-सा लगता है,
ज़िन्दगी मगर अपने ही भीतर बिखरता है।

शहर और ज़िन्दगी दोनों ही इक दरिया हैं,
सफ़र तो बहता है, पर किनारा कहीं नहीं है।

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गांव की पगडंडी चलकर
देखो सड़कों तक हम आये।
रात संजोए जो ख्वाब सलोने
पूरा करने शहर को आये।।

छोड़ खेत खलिहान को पीछे
ताल तलैया और बगीचे।
उम्दा जिन्दगी के ख्वाब लिए
हम भी दौड़ में लग गए पीछे।।

चकाचौंध जो बाहर से दिखती
अंदर अंदर घुटती देखी।
बेहतर का तो पता नहीं पर
जिन्दगी हमने मरती देखी।।

कुटुंब साथ जो रहता उसका
घर आंगन घरवाले छूटें।
मिलन भेट तक तरस गए
शहर जिन्दगी को यूं लूटे।।

क्या क्या ख्वाब सजाए आए
अब जैसे दलदल में फंसते जाए।
दो चार कमाने के खातिर
क्या क्या पीछे छोड़ थे आए।

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जिंदगी ऐसे ओझल हो गई है,
जैसे कोई भूला हो शहर में।

गमों को अब गुनगुना लेता हूं मैं,
जैसे शायर की कोई शायरी हो बह़र में।

सुबह फिर जाना होता है भूखे को काम पे,
जैसे दर्द सारे दवा बन जाते हो रात भर में।

भावनाएं मेरी अनगिनत अब खोती जा रही,
जैसे धाराएं नदी की खो जाती हो समंदर की लहर में।

मैं अब मिट्टी का हो गया हूं,
जैसे तुमने दे दिया तर्पण हो तिरस्कार के ज़हर में।

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एक बीते शहर से गुजरता हुआ एक शख्स
जिंदगी के पुराने पन्नों मे उलझता हर वक्त
अब हर मोड़ यादों की गली नजर आती है
इतने दिनों से समेटे रखे थे जो पल
शहर की सड़कों पर बिखर सी जाती है
आँखें बेतहाशा जाने से चेहरे तलाशती जाती है
एक पुरानी आस! एक बुझ चुकी प्यास फिर से जगा जाती है।

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एक शहर में मेरी जिंदगी रहती है,
वो पल पल मुझे याद करती है,
रात को सपने और दिन में ख्वाब दिखाती है,
अक्सर यूँ मेरा मन बहलाती है,
जब मुझे उस शहर की याद आती है ,
चेहरे पर एक मुस्कान खिल जाती है,
क्योंकि उस शहर में मेरी जिंदगी रहती है !!

रेखा जी की कवितायेँ पढ़िए।


जब से लुभाने लगी उन्हें शहर की जिंदगी
गांव की शुद्धता उन्हें लगने लगी गंदगी
दिखावे की चमक ने घेरा इस कदर
कि शर्मिंदा करने लगी उन्हें गांव की सादगी

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जिंदगी है वीरान दिल में भरा गिला है
शहर की चकाचौंध का बस इतना सिला मिला है

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शहर की हवा अपनी सी है,
लोग पराए से लगते हैं।
ज़िन्दगी तो अपनी सी है
कमबख्त साँसे पराई सी लगती हैं ।

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कहीं रुक जाए ज़िन्दगी
शहर की आखिरी सड़क पर
वहाँ कुछ सुकून ढूंढते हैं

पर हरेक के दिल का सुकून उसे
जिंदगी और शहर की ओर ले घुमा कर
उलटी सड़क पर चलने का दांव फिर से ढूंढता है।

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कैसी लगी आपकी शहर की ज़िन्दगी पर लिखी कवितायेँ और शायरी? अपने विचार ज़रूर लिखें। 

हम आगे भी हिंदी पोएट्री प्रॉम्प्ट की अपनी ये श्रृंखला जारी रखेंगे और साथ ही कहानियों की श्रृंखला भी शुरू करेंगे। हमसे जुड़े रहें और अपने सुझाव हम तक पहुंचायें। 

वैसे ये कोई ज़रूरी नहीं की आप अगले कहानी या पोएट्री प्रॉम्प्ट की राह देखते बैठे। यदि आप अपनी कोई रचना हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित करना चाहते हैं तो तुरंत संपर्क करें ।  

प्रणाम!

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