कवि सम्मेलनों में अक्सर मैं कुछ यूँ शुरुआत करता हूँ: “सीधी सादी भाषा में लिखता हूँ, जटिल नहीं। वो अल्फ़ाज़ हीं क्या जो बस कानों तक पहुंचे, दिल नहीं।” और ऐसा मैं इसलिए कह सकता हूँ क्योंकि मेरी यही कोशिश रहती है की मैं सरल, आम बोलचाल की भाषा में कवितायेँ और शायरी लिखूँ। ऐसी भाषा जो युवा से बुज़ूर्ग और व्यापारी से लेकर मज़दूर तक आसानी से समझ सकें।
बीरेंद्र यादव जी ने मेरे इस परिचय को मुझसे बड़े प्रेम और अधिकार से छीन लिया है।
कैसे? सरल पर प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले बीरेंद्र जी प्रेम, रिश्ते और जीवन की जटिलताओं को बड़े ही खूबसूरत, सरल शब्दों में मिठास के साथ परोस देते हैं। तीन-चार पंक्तियों में सहज और सरल शब्दों में अपने ख़याल हम तक बखूबी पहुँचा देते हैं।
ये एक उदाहरण है जो उनके कविता संग्रह “ख्वाहिश दिल की” से ले रहा हूँ:
इश्क़ और इबादत कहाँ जुदा है साहब
बीरेंद्र यादव “सागर”
आ गया दिल जिस पर, वहीं खुदा है साहब।
कविता संग्रह – ख्वाहिश दिल की
बीरेंद्र जी के कुछ और शब्द उधार ले रहा हूँ इस पुस्तक समीक्षा के लिए:
“इस पुस्तक में हमने ज़िन्दगी के छोटे छोटे पहलुओं पर विचार डाला है। गम, प्यार, इज़हार जैसे छोटे-छोटे लम्हों को दो तीन लाइन की पंक्तियों में कहने की कोशिश की है, जो ह्रदय को छू जाता है।”
वाकई आपके शब्द और उनमें निहित भाव हमारे दिल को छू जाते हैं।

अगर आप मेरी वेबसाइट पर ये पुस्तक समीक्षा पढ़ रहे हैं, तो ये निश्चित है की आप हिंदी साहित्य में रुचि रखते हैं। पहले तो इस बात के लिए मेरा अभिवादन स्वीकार करें। कवियों और लेखकों के लिए आपकी ये रुचि और आपका समर्थन सर्वोपरि है।
हिंदी साहित्य और खासकर कविताओं में रुचि रखने वालों के लिए बीरेंद्र जी की इस अनोखी शैली को पढ़ना ज़रूरी है। ये पुस्तक आप अमेज़न पर खरीद सकते हैं। ज़रूर पढ़ें और अपने विचार नीचे कमैंट्स में साझा करें। धन्यवाद।
बीरेंद्र जी की इन पंक्तियों से इस पुस्तक समीक्षा को विराम दूँगा:
साहब तुम इश्क न करना
बीरेंद्र यादव “सागर”
मुझे समझने के लिए दिल लगेगा,
और सुना है आप हैं दिमाग वाले।
दिल से पढ़ें। आपके स्नेह और समर्थन के अभिलाषी हैं – बीरेंद्र जी, मैं और सभी लेखक – लेखिकाएँ। प्रणाम!