मरीचि की डोरियाँ, कवियत्री रश्मि शुक्ला का पहला काव्य संग्रह है। इस काव्य संग्रह की पहली कविता “पुरानी तस्वीर” की पहली पँक्ति कुछ यूँ है –

“अपने धुँधले शून्य से जब उठाया मैंने सिर……”

ये खूबसूरत ख़याल या तो महज़ एक इत्तिफ़ाक़ है या रश्मि जी की गहन सोच-विचार का नतीजा। इनमें से जो भी कारण हो, एक काव्य संग्रह की शुरुआत के लिए इनसे ज़्यादा उपयुक्त शब्दों का चुनाव मुश्किल है। 

कविता लिखने वाला और उसे पढ़ने वाले यदि कविता के भाव से जुड़ पायें तो धुँधलापन वाकई मद्धम हो जाता है। एक राह नज़र आती है। उम्मीद नज़र आती है, हौसला मिलता है। समस्या जो भी, मुद्दा जैसा भी हो, शून्य विलीन होता नज़र आता है। 

इस संकलन में, रश्मि शुक्ला ने ऐसे कई मुद्दों और विषयों को पहले छेड़ा है, अपना नज़रिया पेश किया है और कुछ को बिलकुल झकझोर कर रख दिया है।

मेरा सौभाग्य कहिये की मैं रश्मि जी का पाठक होने के साथ ही खुद को उनका मित्र भी कह सकता हूँ। मित्रता में अवसर ढूंढ मैंने पुस्तक पढ़ कर सबसे पहले ये सवाल पूछ लिया:

“आपने इस कविता संग्रह का नाम ‘मरीचि की डोरियाँ’ क्यों रखा?”

उनका जवाब भी पढ़िए – “पौ फटने पर जो पहली किरण धरती को छूती है, उसे मरीचि कहते हैं।” तो ये कवियत्री के नाम का एक पर्यायवाची हुआ। और मरीचि की डोरियाँ माने “रश्मि के भाव” । रश्मि जी ने इन किरणों को डोरियों का सन्दर्भ दिया है।

अपने भावों यानी इन डोरियों में कवियत्री ने कई खूबसूरत मोतियों को पिरोया है – कविताओं, ग़ज़लों और गीतों के माध्यम से। 

मरीचि की डोरियाँ – मेरी पसंदीदा रचनाएं 

आश्रय चाहकर गंतव्य में चलती जा रही हूँ 
निर्धारित पथ पर निरंतर मैं ढलती जा रही हूँ। 
योग्यता कुछ और रही जीवन में, जी क्या रही,
परिस्थितयों से हथेली मैं मलती जा रही हूँ।

कभी बेड़ियाँ कभी घुँघरू (मरीचि की डोरियाँ, पृष्ठ ९६)

जीवन चक्र में पहिये सा घूमता हर व्यक्ति, नर या नारी, इन पंक्तियों में अपनी कहानी ढूंढ लेगा।  ऐसी ही कुछ मेरी पसंदीदा रचनाओं की सूची आपको दिए दे रहा हूँ। पूरी पुस्तक पढ़ें, एक से ज़्यादा बार पढ़ें। मगर, इन रचनाओं को कई बार पढ़ें और महसूस करें।

  • महावारी अभिशाप नहीं अभिमान है (पृष्ठ ८)
  • जिजीविषा का जज़्बा (पृष्ठ १४)
  • स्त्री का अस्तित्त्व (पृष्ठ ३७)
  • जैविक घड़ी (पृष्ठ ५०)
  • दरकार नहीं (पृष्ठ ५४)
  • दौर-ए-इम्तिहान (पृष्ठ ६८)
  • कभी बेड़ियाँ कभी घुँघरू (पृष्ठ ९६)
  • आएगा कोई खिजाँ से चलकर बहार में (पृष्ठ १०८)
  • मर्दानगी क्या ऐसे साबित होगी (पृष्ठ ११८)

कवियत्री रश्मि शुक्ला  के शब्द – “यह मेरे और मेरी आभा के आस-पास की छोटी-छोटी चीज़ों के लिए एक तरह का साक्षात्कार का प्रतिबिम्ब होगा। इसे एक बार पढ़ें और सोचकर देखें ज़रूर।”

मैं पूरी तरह से सहमत हूँ। विश्वास है इनके प्रयास और कविताओं को आपका साथ और स्नेह मिलेगा। ये पुस्तक आप अमेज़न पर खरीद सकते हैं। ज़रूर पढ़ें और अपने विचार नीचे कमैंट्स में साझा करें। धन्यवाद।

मरीचि की डोरियाँ – दिल छू लेती रश्मि शुक्ला की कवितायें&rdquo पर एक विचार;

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