सुकून के कुछ पल तलाश करने आपका पहाड़ों पे जाकर ध्यान-मग्न होना ज़रूरी नहीं है। शहर की आपा-धापी के बीच में भी आप सुकून के कुछ पल तलाश सकते हैं। फिलहाल तो आप इन चुनिंदा कविताओं और शायरी का लुत्फ़ उठाइये। इनमें भी बहुत सुकून है।
सुकून के कुछ पल शायरी
अपनी कविताओं के साथ मैं कुछ दिग्गज शायरों के शेर प्रस्तुत कर रहा हूँ। सुकून के कुछ पल मुहैया कराने के लिए इन सभी दिग्गजों को सलाम।
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
- कैफ़ी आज़मी
मैं जिस सुकून से बैठा हूँ इस किनारे पर
सुकूँ से लगता है मेरा क़याम आख़िरी है
- अब्बास ताबिश
सवाल ये नहीं की भीड़ कितनी है
सवाल ये की तेरे साथ कौन है
तन्हाईयों का सुकून जीना तुम सीख लो
बेगानों की बस्ती का शोर मौन है
- नितेश मोहन वर्मा
मुख़्तसर ये है हमारी दास्तान-ए-ज़िंदगी
इक सुकून-ए-दिल की ख़ातिर उम्र भर तड़पा किए
- मुईन अहसन जज़्बी
मिरे सुकून मिरी हर ख़ुशी को ले डूबा
तिरा फ़रेब मिरी ज़िंदगी को ले डूबा
- मशकूर ममनून क़न्नौजी
सुकून लुटता रहेगा फ़ज़ा ही ऐसी है
हमारे शहर की आब-ओ-हवा ही ऐसी है
- असद रिज़वी
सुकून-ए-दिल के लिए इश्क़ तो बहाना था
वगरना थक के कहीं तो ठहर ही जाना था
- फ़ातिमा हसन
हिंदी कवितायें – सुकून के कुछ पल
अब प्रस्तुत हैं मेरी कुछ कवितायें – सुकून ढूंढने के मेरे प्रयास। सुकून के कुछ पल मैं अक्सर चुरा लेता हूँ। नहीं, किसी जंगल या पहाड़ पर नहीं। शहर की आपा-धापी के बीच। अब रोज़-रोज़ पहाड़ों पर जाना मुमकिन नहीं है। मुंबई में रहता हूँ पर फिर भी समंदर से मिलना कभी-कभी हो पाता है।
तो मैंने अपना सुकून इस भागते शहर के शोर में ढूंढ लिया। या यूँ कहें की मैंने सुकून के दो पल, चार पल और बहुत सारे पल चुराना सीख लिया।
सुकून – हिंदी कविता
कवि – नितेश मोहन वर्मा
कभी कभी बस यूँ ही
निकल पड़ता हूँ शहर की भागती सड़कों पर
बदहवास दौड़ते वाहनों के बीच
सब अनदेखा, अनसुना कर
अपनी धीमी चाल से
इस पार से उस पार जाता हूँ
फिर इस पार लौट आता हूँ
बदहवास दौड़ते वाहन एकाएक रोक दिए जाते हैं
मैं कोई इशारा नही करता
उनके लिए किनारा नही करता
कभी कभी बस यूँ ही
इस भागते, दौड़ते, चीखते शहर से
मैं छीन लाता हूँ
अपना दो पल का सुकून।
हिंदी कविता – सगा पंखा
कवि – नितेश मोहन वर्मा
खिड़की के परदे को चीर कर झाँकती
शनिवार के सुबह की धूप
जानी पहचानी सी
शहर की व्यस्त आवाज़ें
बनिए की दुकान का रह रह कर खुलता शटर
साठ साल पुराने चाचा का उतना ही पुराना स्कूटर
मैं अनसुना करने की कोशिश में हूँ
अपने सफेद पंखे से बात करता
रुक रुक कर आता उसका संगीत
उसकी खटर खटर
वो सुन लेता है मुझे
समझ लेता है मुझे
कुछ मेरे जैसा वो भी आधा सोया
आधा जगा सा है
व्यस्त शहर की व्यस्त आवाज़ों में
पंखा मेरा सगा सा है।
चख ले जीवन का सुकून (कविता)
कवि – नितेश मोहन वर्मा
ये गाड़ियों का शोर
चुँधियाती रौशनी
धक्का मुक्की, रेलम रेल
थोड़ा रुक जा, थम जा
तू यूँ न सहम जा
देख वो चौराहे के बायीं तरफ
वो पीपल के नीचे काका की टपरी
मैं, तू, हम जैसों का हुजूम
कटिंग चाय, वड़ा पाव
चख ले जीवन का सुकून
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कभी कभी बस यूँ ही
इस भागते, दौड़ते, चीखते शहर से
मैं छीन लाता हूँ
अपना दो पल का सुकून
और कइयों को दे जाता हूँ
पल दो पल कि दहशत
😅
ये आपने खूब कही 😀
“सगा पंखा”
अत्यंत बेहतरीन है यह मन कि बात जिसे आपने शब्द दिए हैं !
कुछ मेरे जैसा वो भी आधा सोया
आधा जगा सा है
व्यस्त शहर की व्यस्त आवाज़ों में
पंखा मेरा सगा सा है….. (पढ़ते पढ़ते अनायास ये शब्द मन में आए 🙂
शायद हम दोनों जानते हैं
चलते रहना ही ज़िन्दगी का शोर है,
और रुक जाना, उसका सन्नाटा।
वाह! रुक जाना सन्नाटा है। पंखे और हमारे लिए ये कितना सटीक है। बहुत शुक्रिया 🙏