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न जाने कितने ही मनुष्य रावण के दस सिरों से ज़्यादा अहंकार अपने एक सिर में लिए घूम रहे हैं। शायद ऐसे ही किसी एक अहंकारी के दम्भ ने इस संग्रह की सोच को जन्म दिया। प्रस्तुत है भारत के भिन्न-भिन्न शहरों से उन्नीस कवियों और कवयित्रियों का एक सामूहिक जवाब और साझा संकलन : ‘मैं – सूक्ष्म, प्यासा, मुखौटा’।

Description

प्रतिज्ञान प्रकाशन का यह काव्य संग्रह आत्म-खोज और व्यक्तिगत पहचान को समर्पित है। हमने इस कविता संग्रह में उन मर्मस्पर्शी कविताओं को सम्मिलित किया है, जो कवि के नज़रिए से ‘मैं’ के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत करती हैं। 

  • सूक्ष्म : वह आंतरिक सत्य, वह बारीक एहसास जो दुनिया से छिपा है।
  • प्यासा : वह निरंतर तलाश, वह अपूर्णता जो हमें आगे बढ़ने पर मजबूर करती है।
  • मुखौटा : वह सामाजिक आडंबर, वह नकाब जो हम बाहरी दुनिया को दिखाते हैं।

इन कविताओं के ज़रिये उन्नीस कवियों और कवयित्रियों ने इंसान के अहंकार को एक सामूहिक जवाब दिया है। पढ़िए और अपने विचार ज़रूर साझा करें। 

Additional information

Weight 0.210 kg
Dimensions 21 × 14.8 × 0.7 cm

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