इस कविता की प्रेरणा है डर्क स्कीबा द्वारा ली गयी रोशेल पोटकर की श्वेत श्याम तस्वीरें | धन्यवाद डर्क और रोशेल | पूरी कविता पढ़ें |
कुल्हड़ और सवाल
सवेरे सात बजे, बिना इज़ाज़त किसी भले मानस की काली स्कूटर पे बैठ | चेहरे पर खिलती धूप, बीच बाजार अंगड़ाई ली, हाथ पाँव लिया ऐंठ | भुबनेश्वर में सवेरे चाय पीने निकला और चाय की चुस्कियों के साथ आपके लिए ये एक छोटी सी कविता लिख डाली |
फ़कीर
बस दो झोला भर है वसीयत मेरी। ज़िंदगी समेट कर निकल पड़ा हूँ, ज़िंदगी की तलाश में। पढ़िए हिंदी कविता "फ़कीर"| कवि न जाने किस तलाश में निकल पड़ा है?
जात
मैं ढून्ढ लूँगा अपना रब इंसानों में कहीं, पत्थरों से मैं यूँ भी बात करता नहीं। इतना है खून बहा, इतनी है लाशें देखी । तलवारों से, हत्यारों से, अब मैं डरता नहीं।
समर्पण
तेरे अरमानों का कत्ल करता रहा, तेरे समर्पण से खुद को मर्द माना। मर्दानगी का खोखला एहसास।
रात और मैं
रात की खामोशी और तन्हाई जीवन सँघर्ष में एक अल्पविराम के जैसे हैं।
बेघर
इनका कोई पक्का ठिकाना नहीं होता है। महानगरों में मेहनत मज़दूरी कर अपने परिवार का पोषण करने वाले ये मेहनतकश हर रोज़ बेघर होते हैं।