न छत की दरकार
न खिड़की न दीवार
खामोश रातों में
सूनी राहों में
इनका बसेरा होता है
रोज़ होते हैं
बेघर
जाने क्यों
सवेरा होता है
न छत की दरकार
न खिड़की न दीवार
खामोश रातों में
सूनी राहों में
इनका बसेरा होता है
रोज़ होते हैं
बेघर
जाने क्यों
सवेरा होता है