प्रतिज्ञान प्रकाशन
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हमारी हिंदी पत्रिका के पहले तीन अंक ईबुक के स्वरुप में अमेज़न पर उपलब्ध हैं। हमने नए रचनाकारों की कहानियों, कविताओं, शायरी और लेख का बेहतरीन संग्रह प्रस्तुत किया है। अभी पढ़ें और अपने विचार और सुझाव हमसे साझा करें।
मैं – सूक्ष्म, प्यासा, मुखौटा (काव्य-संग्रह)


न जाने कितने ही मनुष्य रावण के दस सिरों से ज़्यादा अहंकार अपने एक सिर में लिए घूम रहे हैं। शायद ऐसे ही किसी एक अहंकारी के दम्भ ने इस संग्रह की सोच को जन्म दिया। प्रस्तुत है भारत के भिन्न-भिन्न शहरों से उन्नीस कवियों और कवयित्रियों का एक सामूहिक जवाब और साझा संकलन: ‘मैं – सूक्ष्म, प्यासा, मुखौटा’। निःशुल्क डिलीवरी के लिए अभी प्री-आर्डर करें।
प्रतिज्ञान के सितारे – पुस्तक विमोचन कार्यक्रम

शनिवार, १० जनवरी २०२६ को नवी मुंबई के ‘टर्न-अ-पेज’ पुस्तकालय में प्रतिज्ञान प्रकाशन के प्रथम काव्य-संग्रह ‘मैं – सूक्ष्म, प्यासा, मुखौटा’ का भव्य विमोचन हुआ। समारोह के मुख्य अतिथि मुंबई और नवी मुंबई में बसे इस संग्रह के रचनाकार स्वयं थे। यह संकलन भारत के विभिन्न शहरों से ताल्लुक रखने वाले उन्नीस कवियों और कवयित्रियों का एक अनूठा साझा प्रयास है। इस गहन विषय पर उनके अनकहे ख़याल और गहरे सवाल पढ़ने के लिए आज ही अपनी प्रति मंगवाएं।
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मुखौटा – मजबूरी, फितरत या साजिश | हिंदी कविता प्रॉम्प्ट
कभी मजबूरी, कभी फितरत और कभी साजिश। इंसान कई चेहरे लगाता है। हमने ‘प्रतिज्ञान’ परिवार के सदस्यों से आग्रह किया की ‘मुखौटा’ शब्द पर अपने ख़याल लिख कर भेजें। अभी पढ़ें।
‘प्रतिज्ञान’ का तीसरा अंक प्रकाशित: जब ‘जात’ बन जाती है सबसे बड़ी चुनौती!
हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ के तीसरे अंक में पढ़िए ‘अग्नि परीक्षा’ का अगला भाग ‘जात’, जहाँ पत्रकार शालिनी लड़ रही है सत्ता से। साथ ही अन्य कवितायेँ, कहानियाँ, शायरी और बहुत कुछ।
गणित के प्रोफ़ेसर की शब्द-साधना: डॉ. देवेंद्र कुमार की कवितायें
प्रत्तिज्ञान की “नयी कलम” श्रृंखला में पढ़िए डॉ. देवेंद्र कुमार की तीन मार्मिक कवितायें। उनकी सरल मगर गहरी रचनाएं: ‘तुम राजदार थे उसके तुम्हें पता होगा’, ‘याद रखना यह वचन’, और ‘समंदर किनारे’ – के साथ कवि का विशेष परिचय।
हिंदी शायरी
नितेश मोहन वर्मा द्वारा

“तुझे इल्ज़ाम देने का हक खो दिया मैंने।
मैं खामोश रहा, मैं भी गुनहगार हूँ।”
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“उल्टे कदम कुछ दूर चल साथ मेरे ऐ वक्त।
उन लम्हों को फिर से जी लेना चाहता हूँ मैं।”
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“भूल न जाए ये ज़माना।
ऐ मौत तेरे आने से पहले,
कुछ लफ्ज़ छोड़ जाऊँ किताबों में मैं।”
