नया होने के लिए कितना नया होना ज़रूरी है। और पुराना होने के लिए कितना पुराना? एक सदी, दशक, साल, महीना, पखवाड़ा, सप्ताह, दिन, पहर, घंटा या महज़ एक पल? जब २०२५ के आखिरी अंक का सम्पादकीय लिखने बैठा तो एक ये ख़याल आया। 

खैर ये तो गणितीय मानक है। अनुभूतियों का क्या? इंतज़ार के पल मिलन के पलों से कई गुना लम्बे होते हैं। 

दुःख के पल सुख के पलों से ज़्यादा। इनका मानक क्या है? 

क्या साल के पुराने हो जाने से हर चीज़ पुरानी हो जाती है? अनुभव? एहसास? रिश्ते? साहित्य?

ये एक दिलचस्प बहस और चर्चा है का विषय है। फिलहाल आप पढ़ें प्रतिज्ञान का दिसंबर अंक। कुछ नया ले कर आये हैं हम इस बार – रोमांच, भय और अलौकिक किस्सों का तड़का। 

पढ़िए प्रतिज्ञान का दिसंबर २०२५ का अंक। पढ़िए प्रतिज्ञान के अब तक के सभी अंक


झलकियाँ : प्रतिज्ञान अंक ४ | दिसंबर २०२५

Hindi Horror Story by Nitesh Mohan Verma.

अतृप्त (कहानी)

तीन घंटे की तलाश के बाद पिंटू मिला। गाँव के प्राथमिक विद्यालय के शौचालय की दीवार के पीछे। नग्न शरीर, मृत पिंटू। चेहरे का आकार एक महीने में बढ़ कर दोगुना हो गया था। कमर के नीचे का पूरा बदन सूख गया था। सड़ चुके गाढ़े लाल में जैसे काले से भी ज़्यादा काला रंग मिला दिया गया था। हाथों और छाती में भूरे बालों का गुच्छा उग आया था। आँखें खुली थी। नहीं! पलकें नही थीं। जीतन ने अपने गमछे से जितना हो सका ढक दिया।

चुप्पी (कहानी)

रिया ने धीमे, पर बेहद साफ़ स्वर में कहा – “सबूत? लड़की के पास सबूत कब होते हैं? औरत के सच को उसकी बात में नहीं, उसके चरित्र में ढूँढा जाता है। अगर मैं चीखती, तो कहते बदतमीज़ हूँ। थाने जाती, तो कहते गलत नीयत से गई। अगर चुप रहती, तो सबसे पहले मुझे ही दोषी बताते। लड़की हर हाल में अपराधी ही ठहराई जाती है।” कुछ पुरुषों ने अपनी नजरें झुका लीं। औरतों की आँखों में पहली बार चमक आई। किसी ने उनके भीतर दबे हुए ज़ख्मों को आवाज़ दी थी।

किसान की अभिव्यक्ति (कविता)

मैं एक निहायती शराफत से भरा बेईमान हूँ 
साल भर मेहनत करने के बाद भी
तिनका जोड़ने वाला अपमान हूँ
क्योंकि मैं आज का
एक निम्नवर्गीय किसान हूँ

मन की खुली हवा जैसी बातें (कविता)

कभी-कभी लगता है कि प्रकृति हमें समझाने नहीं
संभालने आती है
जैसे पत्तों का हल्का-सा हिलना भी कह देता है
“रुक जाओ, साँस लो, तुम अभी भी ज़िंदा हो।”
बादलों की चाल में भी अजीब-सी शांति होती है
ऐसा लगता है कोई ऊपर से हमारी बेचैनियों को धीरे-धीरे
धोकर हल्का कर रहा हो

जलते ख्वाब (कहानी)

प्रत्येक स्त्री की जीवन यात्रा व उससे प्राप्त अनुभव एक दूसरे से विभिन्न होते हैं। जैसे इधर जूही का जीवन शादी के बाद अच्छा चल रहा था तो उधर दिव्या अभी भी किसी अच्छे हमसफ़र की तलाश में थी। दोनों सहेलियों की उम्र में बहुत अंतर था। दिव्या जूही से ज़्यादा बड़ी थी। जूही अभी तीस से कम ही थी। दिव्या का ये इश्क़ मुहब्बत का हिसाब कुछ सही तो नहीं बैठा और रास भी ना आया, फिर भी उसे भरोसा था कि सही पुरुष उसके जीवन में ज़रूर आयेगा जो उसके जीवन को प्रकाश से भर देगा। आज उसके हाथ में कपड़ों के साथ ही एक गिफ़्ट आया जो आज भी ख़ूबसूरत लग रहा था। उसको देखकर कितने ही सुखद लम्हें स्मरण हो आये। वो कहीं पीछे पहुँच गई थी, जो अब बस यादें थीं ..!

विश्वास की राख (कहानी)

थाने की हवा में पुरानी फाइलों की सीलन और गीले पत्थरों की गंध घुली हुई थी। जब पुलिस अनीता को भीतर लेकर आई, तो वह वैसी बिल्कुल नहीं लग रही थी जैसी राजू उसे अपने घर के आँगन की मद्धम रोशनी में देखता था। उसके चेहरे का वह संकोच अब एक पत्थर जैसी खामोशी में बदल चुका था। उसकी नजरें तब तक नहीं झुकीं, जब तक उसकी आँखें सामने खड़े राजू से नहीं टकराईं।

एक स्त्री की अनंत यात्रा (कविता)

मैं अधूरी इसलिए नहीं कि मुझे कोई पूरा करे
मैं अधूरी इसलिए हूँ
क्योंकि मैं हर पूर्णता के पार
एक और क्षितिज ढूँढ लेती हूँ
मेरे कदमों के नीचे
धरा अक्सर थक जाती है
पर मैं यात्रा नहीं छोड़ती
क्योंकि मेरे भीतर वह भूख है
जो समय से भी पुरानी है

बातों के परिंदे (संवाद)

मुंबई लोकल हो या दिल्ली मेट्रो। इनका सफर एक खिचड़ी है – कभी स्वादिष्ट, कभी फीका, कभी नमकीन। ज़्यादातर यात्री अपने मोबाइल फोन से चिपके मिलेंगे, कोई एक सज्जन किताबों में गुम मिल सकता है, कोई अपने ख्यालों में। इनके बीच और आस-पास मंडराती हैं भिन्न भाषाओं और लहजों में अनगिनत आवाज़ें। एक-दुसरे के शब्दों से लड़ते, भिड़ते, बचते-बचाते वो अपने गंतव्य तक पहुँचते हैं। राहुल जी लेकर आये हैं कुछ चुने हुए मोती – मेट्रो की परवाज़ें। पढ़िए, आनंद लीजिये और आपस में उलझे इन धागों के कई सिरों को खोजने के एक सफर में आप चल पढ़िए।

वो सवारी जो कभी उतरी नहीं (कहानी)

उसका दिमाग़ एक ही सवाल में अटका था। अभी तो वह लड़की पीछे बैठी थी। तो फिर वह सामने कैसे आ गई। चलती रिक्शे से कोई उतर नहीं सकता। और अगर उतर भी जाए, तो इस तरह सड़क के बीच अचानक खड़ा होना किसी जीवित इंसान के बस की बात नहीं। उसने पीछे की सीट की ओर देखा। खाली। उसने अपनी आँखें मल लीं। उसे लगा शायद डर की वजह से कुछ ग़लत दिख गया हो। पर उसके सीने में जो ठंड उतर रही थी, वह झूठ नहीं थी। एक पल में सब कुछ बदल गया था। रिक्शा, सड़क, कार, ट्रक और वह लड़की। जैसे किसी ने समय को मोड़ दिया हो।