मासिक हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ अपने रोमांचक तीसरे अंक के साथ वापस आ गया है, जिसमें उच्च दाँव वाले फिक्शन, चुनौतीपूर्ण सामाजिक टिप्पणी और गहरी अनुगूँज वाली कविताओं का एक शक्तिशाली मिश्रण है। इस अंक की ख़ास पेशकश ‘जात’ सिर्फ जाति नहीं, बल्कि सामाजिक पदानुक्रम, वर्ग और उस नग्न सत्ता की पड़ताल करती है जो मानवीय नियति को नियंत्रित करती है।

इस अंक में:

समकालीन हिंदी लेखन के समृद्ध संग्रह में गोता लगाएँ, जिसमें शामिल हैं:

  • धारावाहिक अग्नि परीक्षा का रोमांचक दूसरा अध्याय
  • सोच-विचार को प्रेरित करने वाली लघु कहानियाँ
  • शक्तिशाली समकालीन कविताएँ और आलोचनात्मक निबंध
  • धर्मवीर भारती जी की कालजयी रचना ‘गुनाहों का देवता’ की समीक्षा
  • हिंदी साहित्य की पाँच सशक्त महिला साहित्यकारों पर एक विशेष प्रस्तुति 
  • मोहब्बतनामा – शायरी संग्रह 

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झलकियाँ – प्रतिज्ञान अंक ३ | नवम्बर २०२५

सम्पादकीय – ‘टोस्ट, बटर और आक्रोश’

हम एक ऐसे समय और समाज में जी रहे हैं जहाँ निंदा करना कर्म के बराबर समझा जाता है। आतंकवाद की निंदा, भ्रष्टाचार की निंदा, सरकार की निंदा। जितनी ऊँची आवाज़ में निंदा की जाए, हमारा-आपका कर्म उतना ही महान हो जाता है। मगर सवाल यह है – ‘मैं एक सज्जन हूँ’ के इस पर्दे के पीछे हम कब तक अपने आक्रोश को मौन रखेंगे? क्या टोस्ट, बटर खाकर हम संतुष्ट हैं, यह मानकर कि दूसरों के दुःख में मेरा कोई दोष नहीं है? यह संपादकीय हमें सोचने पर मजबूर करता है कि बदलाव केवल एक घटना नहीं, एक लम्बा सफर है। और उस सफर का पहला कदम है आज रात खुद के सज्जन होने पर सवाल करना। आपका आक्रोश मौन क्यों है?

मामु सबके सगे हैं – आसिफ अंसारी (कहानी)

पान की पीक और मामुजान के कुर्ते के बीच की जंग तो बरसों से चली आ रही है। कौन ज़्यादा लाल? सच कहें तो मुझे दोनों ही बराबर के लाल लगते हैं। जब तक आप एकदम क़रीब जाकर ग़ौर से न देखेंगे, तब तक यह बता पाना बड़ा मुश्किल है कि मामु के सफ़ेद कुर्ते में कहाँ-कहाँ पान की पीक के पुराने धब्बे पड़े हैं। ये दोनों चीज़ें, पान और कुर्ता, मामु के बड़े पक्के सगे हैं, एकदम जिगरी दोस्त। 

लेकिन सिर्फ़ ये दोनों ही थोड़े न हैं मामु के सगे?

क्या ज़िंदा हो तुम? – शिव कुमार शर्मा (कविता)

क्या ज़िंदा हो तुम कि नहीं?
ज़िंदगी कई दफ़े मर्दों को ये याद दिलाती है
कैसे?
जब किस्तें महीने के आख़िर में 
दरवाज़े पर दस्तक लाती हैं
घर की ज़रूरतें शिकन बनकर 
मस्तक पर छाती हैं

हैप्पी बर्थडे सुधा – नितेश मोहन वर्मा (एक खत)

एक बात बोलूँ? अब तुम बातों में मुझे हरा नहीं सकती। मैं जो भी बोलूँ तुम्हें सुनना होगा। बताओ कैसा लग रहा है? अब मेरी हर बात सही। वैसे जब तुम चिढ़ कर मेरी बात बीच में काट रेल की रफ्तार में बोलती थी, जी करता था झट से गले लगा लूँ। यहीं मात खा गयी हमारी पीढ़ी। तुम्हें प्यार से गले लगाने के ऐसे कितने मौके मैंने यूँ ही जाने दिये।

‘रुई के टुकड़े’ और अन्य कवितायेँ – सारंग भांड 

परेशान हूँ …
तुम्हारे बहते हुए आँसूओं से 
कहीं छलक न जाये 
तुम्हारी आँखों की चमक…
यह चमक ही तो मेरे हर दर्द की दवा है।

गुनाहों का देवता (पुस्तक समीक्षा)

प्रेम में समर्पण, प्रेम और समर्पण, बिना प्रेम के समर्पण, प्रेम में वासना की महत्ता, पुरुष और स्त्री के दायित्व, उनके कर्तव्य और उनसे अपेक्षायें, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था, समाज, परिवार और राजनीति में स्त्री की भागीदारी – ऐसे अनेक पहलुओं को बहुत बारीकी और जटिल सरलता हे परखा है धर्मवीर भारती जी ने हिंदी साहित्य के कालजयी उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ में।

कैशबैक – अंकित राज ओझा (कविता)

बड़ा होने से जुड़े तमाम प्रपंचों के दौरान 
कहीं से एक यह बात भी दिमाग में आ कर 
घर कर गयी 
कि वास्तविक सुख देने वाली वस्तुएँ तो जीवन 
मुफ़्त में या बड़े सस्ते में दिला देता है।

मिस कुलक्षिणी – कावेरी झा (कहानी)

मैं अपने जाने का कुछ बता पाती, उसके पहले उसने विदा ले ली। हां जाते जाते घूम घूम कर घूरती रही। वैसे घूरती आंखों की कोई कमी नहीं थी। शहर इतने सालों में बहुत बदल सा गया है। मॉल और मॉल में स्टारबक्स है। खाने के लिए फूड कोर्ट है और मल्टिप्लेक्स है। दिखावे के ट्रैफिक सिग्नल हैं और सरपट भागते दुपहिया वाहनों पर रंगीन यूनिफॉर्म में झटपट डिलीवरी करने वाले सुपरहीरो। बस घूरना वही है। पर कहां वो सत्रह बरस की अल्हड़ लड़की और कहां पैंतालीस के मैं अधेड़ औरत।

अग्निपरीक्षा अध्याय २ – ‘जात’ – नितेश मोहन वर्मा (कहानी)

अशोक का पर्यायवाची है संकोच। अपनी प्रेमिका को यूँ बंद कमरे के एकांत में आगोश में कसकर किस बात का संकोच? उसकी उँगलियाँ कमर से होते हुए गर्दन तक पहुँचने की कोशिश में लगी हुईं थीं। उँगलियों के इस नृत्य का बहुत अनुभव था शालिनी को। उसने झट दोनों हाथों से अशोक का चेहरा थाम चूम लिया होठों को। अशोक ने लय पकड़ी और जाँघों को सहारा देकर शालिनी को गोद में उठा लिया। नहीं अब संकोच नहीं था।

स्त्री ऋण – शिव कुमार शर्मा (कविता)

अनादि काल से स्त्रियों ने हर स्वरूप को बखूबी संभाला है
शौर्य, प्रेम, मातृत्व, सहिष्णुता
हर भाव को उन्होंने बड़ी संकीर्णता से खंगाला है
जिस घर को उन्होंने बहन और बेटी बन
निस्वार्थ प्रेम और त्याग के साथ संभाला है
विवाह के पश्चात एक ही रात में 
उन्हें उसी घर ने पराया धन कहकर निकाला है

शब्दों की दुनिया में औरतें – विशेष प्रस्तुति 

यह विडंबना ही है कि अक्सर चर्चा और प्रशंसा की ज़्यादातर रौशनी पुरुषों के हिस्से आती है, जबकि साहित्य एक ऐसा संसार है जहाँ विषय, संवेदना और विमर्श का महत्त्व लिंग भेद से परे होता है। महत्त्व दोनों का बराबर है, फिर चाहे वह पुरुष की कलम हो या स्त्री की।

इसलिए, इस बार की ख़ास पेशकश में हमने रौशनी का रुख़ मोड़ा है। हम आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं हिंदी साहित्य की पाँच ऐसी अप्रतिम और सशक्त लेखिकाओं से जिनमें स्थापित नाम भी हैं और वे भी जो अपनी नई दृष्टि और लेखन से साहित्य जगत में तेज़ी से अपनी पहचान बना रही हैं। यह खंड उनकी रचना-यात्रा, साहित्य में उनके अमूल्य योगदान और उनकी चुनिंदा किताबों पर एक गहन दृष्टि डालता है।

शर्मीली यारों – डॉ. देवेंद्र कुमार (कविता)

मेरी जुबां हो गई अब हठीली यारों
उम्र के साथ हो रही तब्दीली यारों 

मुसीबतों का पहाड़ टूटा उस पर फिर भी 
सब को हं‌साकर खुश है शर्मीली यारों

रतनवा की अम्मा – नितेश मोहन वर्मा (कहानी)

लल्लन सिंह गाँव के ज़मींदार लालसिंह का इकलौता बेटा है। कपूत होने के सभी गुणों में स्नातक कर चुका है। सात संतानों में अगर ये अकेला पुत्र नहीं होता तो लालसिंह अपने हाथों से गला घोंट खेत में पीपल के पास गाड़ दिए होते। रात देर से घर लौटा था। पूरा नहीं लौटा था। दरवाज़े के बाहर मूर्छित पाया गया था। छह लोग लगे उसे उठा कर कमरे में चौकी पर लिटाने में। तब से उसी अवस्था में है। आँखें खुली हैं, एकटक छत पर टिकी हैं। रह-रह कर मुंह से लार टपक रही है।

मोहब्बतनामा: इश्क़, दर्द और जुनून के चंद अफ़साने (शायरी संग्रह)

मोहब्बत… वो जज़्बा, जिसने दुनिया की सबसे बेहतरीन नज़्मों और ग़ज़लों को जन्म दिया है। यह सिर्फ़ एहसास नहीं, यह ज़िंदगी की पूरी दास्तान है – कभी मुकम्मल, तो कभी अधूरी। प्रतिज्ञान के तीसरे अंक में हम पेश कर रहे हैं मोहब्बत पर कुछ मशहूर और सदाबहार शेरों का संग्रह, जो इश्क़ की हर करवट और हर मंज़र को बयाँ करते हैं।

इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के
- मिर्ज़ा ग़ालिब