सफर ज़िंदा है जो मोड़ आते रहें, मंज़िल पर मुसाफिर तमाम हुआ करते हैं। हिंदी पत्रिका ‘प्रतिज्ञान’ के बारहवें अंक में पढ़िए सफर, सवाल और खोज पर आधारित चुनिंदा कहानियाँ, कवितायेँ और लेख।
ज़िन्दगी की तपिश कायम रहे, सवाल वो फूंक हैं
नितेश मोहन वर्मा
जवाब तो अक्सर पूर्ण विराम हुआ करते हैं
सफर ज़िंदा है जो मोड़ आते रहें
मंज़िल पर मुसाफिर तमाम हुआ करते हैं
साहित्यिक यात्रा के इस विशेष पड़ाव पर, ‘प्रतिज्ञान’ (अंक १२) आपके सामने प्रस्तुत है। यह अंक केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य के विविध रंगों, संवेदनाओं और नए विचारों का एक समृद्ध दस्तावेज़ है।
इस अंक में हिंदी साहित्य के उभरते और स्थापित रचनाकारों की चुनिंदा कविताएं, मर्मस्पर्शी कहानियां और विचारोत्तेजक आलेख शामिल हैं। हर रचना जीवन के विभिन्न पहलुओं, मानवीय भावनाओं और सामाजिक सरोकारों को एक नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है।
इस अंक की मुख्य विशेषताएं
- संवेदनशील कविताएं: आधुनिक जीवन के संघर्ष, प्रेम, आशा और दार्शनिक पहलुओं को छूती रचनाएं।
- मर्मस्पर्शी कहानियां: ऐसी कथाएं जो आपको विचार करने पर मजबूर कर देंगी और सीधे दिल को छू लेंगी।
- साहित्यिक विमर्श: आज के दौर में सफर और सवालों की भूमिका और युवा रचनाकारों की सोच को दर्शाते आलेख।
चाहे आप साहित्यप्रेमी हों, कविता के शौकीन हों या नए लेखकों को पढ़ने के उत्सुक हों, ‘प्रतिज्ञान’ का यह १२वां अंक आपकी डिजिटल लाइब्रेरी के लिए एक अनमोल उपहार है।
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इस अंक के रचनाकार
आशीष गौड़, गगन शुक्ल दीप, कल्पना पांडे, कनक अग्रवाल, मानसी पांडे, मीनल गुप्ता, नितेश मोहन वर्मा, पिंकी गिरी, प्रयागी अभिषेक पांडे, रश्मि शुक्ला सैयाही, सचिन कुमार त्रिपाठी, सुबोध कुमार सिन्हा, तेजस्विनी अरविन्द नवले
सम्पादक – नितेश मोहन वर्मा
सह सम्पादक – शिव कुमार शर्मा
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