सामाजिक रिश्ते एक व्यवस्था हैं। वो प्रेम का मापदंड नहीं हो सकते। प्रेम का कोई मापदंड नहीं हो सकता। कला के भरसक प्रयासों के बावजूद प्रेम की परिभाषा को शब्दों, रंगों, चित्रों, धुनों में समाहित नहीं किया जा सकता। हम अपने ख़यालों, अनुभूतियों और कला से बस प्रेम को महसूस करते हैं। जो महसूस करते हैं, उसे ही लिखते हैं, बनाते हैं और बताते हैं।
अपनी सीमित समझ की मार्फ़त आपसे बस ये विश्वास के साथ कहूँगा कि प्रेम में समर्पण ज़रूरी है। यदि समर्पण नहीं है, यदि समर्पण की कोई शर्त है तो प्रेम नहीं है। प्रेम कहानी अधूरी हो सकती है, प्रेम नहीं। प्रेम या तो पूर्ण है या नहीं है। इन कहानियों और कविताओं में किरदारों को पढ़ते समय मैंने यही समर्पण तलाशने की कोशिश की है। आप भी करें। वर्तमान में फैली अराजकता, अविश्वास और अशांति का एक समाधान है। प्रेम। साहित्य का दायित्व है प्रेम की अनुभूति और संभावनाओं को जीवित रखना।
प्रतिज्ञान का यह अंक एक ऐसा ही खूबसूरत प्रयास है।
इस अंक के रचनाकार
- आयुष मिश्रा
- अरुणा महेश जाजू
- गगन शुक्ल ‘दीप’
- हर्षा बागडे
- कनक अग्रवाल
- मानसी पांडे
- मीनल गुप्ता
- नितेश मोहन वर्मा
- पिंकी गिरी
- रश्मि शुक्ला ‘सैयाही’
- रितेश सिंह
- प्रोफ़ेसर शंकर सहाय
- शिव कुमार शर्मा
- सुबोध कुमार सिन्हा
- सुमंत राठौर
- सनशाइन सुषमा
- तेजस्विनी अरविन्द नवले
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