इस कविता में कवि अपनी प्रेमिका के रूप का गुणगान कर रहा है। रूप वो नहीं जो उम्र के साथ ढल जाये। जो कभी मद्धम न पड़े, जिसकी कभी शाम न हो। कवि अपनी प्रेमिका के व्यावहारिक गुणों हुए और उसके नारीत्व का बखान कर रहा है।
मुलाकात
इस कविता में कवि अपनी प्रेमिका से अपने निःस्वार्थ प्रेम का एहसास बयान कर रहा है। वो बताना चाहता है की कैसे उसका होना हीं कवि के जीवन को सार्थक बनता है।
आम का द्वन्द
आम इंसान अपनी रोज़ी रोटी और घर परिवार में उलझा रह जाता है। देश और समाज के प्रति उसकी ज़िम्मेदारियों का एहसास स्वतः हीं दब दब कर अपनी पहचान खो देता है। लेकिन वक़्त और हालातों की पुकार उस एहसास को जगाने की निरंतर कोशिश करते हैं। ये कविता अपनी सांसारिक बेहोशी से जागे एक आम इंसान के द्वन्द की ललकार है।
किसका कसूर?
गरीबी और मुफलिसी किसका कसूर है ? गरीब का? या फिर गरीबों की बस्ती को महलों की ऊँचाइयों से अनदेखा करने वाली नज़रों का। अपना घर बसाने में हम कहीं किसी गरीब की आह के ज़िम्मेदार तो नहीं बन बैठे ?
गोल दुनिया
दिन भर की भूख के बाद, जब मज़दूरी कर लौटी माँ रात को उसे रोटी देती है, उसकी दुनिया जैसे उस रोटी में सिमट जाती है। उसकी दुनिया उस गोल रोटी की भाँति गोल है।
५ रुपये का सिक्का
किसी भी चीज़ की कीमत उसे इस्तेमाल करने वाले की ज़रुरत पर निर्भर करती है। जो ५ रुपये का सिक्का किसी के लिए चिल्लड़ कहलाता है, वही सिक्का किसी और के लिए अनमोल हो सकता है।
तेरे जाने की वजह
"तेरे जाने की वजह" एक प्रेमी की कुछ पंक्तियों का संग्रह है। अपनी प्रेमिका से अलग होने के बाद, प्रेमी अब भी उसके इंतज़ार में है।
तन्हाई
ये हिंदी कविता तन्हाई, कवि का अपनी प्रेमिका से बिछड़ जाने के एहसास का वर्णन है। "याद है वो तुमसे टकरा जाना, फिर गिरना तुम्हारे हाँथो से उन किताबों का। वो पह्ली बार मिले थे हम तुम, फिर चला था सिलसिला कई मुलाकातों का।
जात
मैं ढून्ढ लूँगा अपना रब इंसानों में कहीं, पत्थरों से मैं यूँ भी बात करता नहीं। इतना है खून बहा, इतनी है लाशें देखी । तलवारों से, हत्यारों से, अब मैं डरता नहीं।
समर्पण
तेरे अरमानों का कत्ल करता रहा, तेरे समर्पण से खुद को मर्द माना। मर्दानगी का खोखला एहसास।